और उन बेज़ुबान क़ैदियों में से वो किताबें भी हैं जो तुमने ला...
Ummah Post
31 December, 2023

और उन बेज़ुबान क़ैदियों में से वो किताबें भी हैं जो तुमने लाकर अलमारी में बिन मुताला (बिना पढ़े) रखी हैं। गर्द-ओ-गुबार (धूल-मिट्टी) की तह चढ़ चुकी है; जीते जी क़ब्रिस्तान में मदफ़ून (दफ़्न) हैं। औराक़ (पन्ने) अपनी तबई (प्राकृतिक) ज़िंदगी के दिन काट रहे हैं, मगर बेरहम मुजाविर (रखवाले) को उन्सियत (लगाव) का ख़्याल तक नहीं गुज़रता और न यह कि अपनाइयत का भरम रखकर गर्द-ओ-गुबार झाड़कर आँखों से लगा ले, प्यार भरे लबों से बोसा (चूमना) देकर कुछ लम्हात के लिए ही सही मगर करे कुछ वरक़-गरदानी (पन्ने पलटना)।

- सरीर

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"मेरी ज़िंदगी में दो रातों के सिवा कोई रात ऐसी नहीं गुज़री जब मैंने इल्म (ज्ञान) की जुस्तजू (खोज) में कुछ साअतें (पल) किताब के साथ न गुज़ारी हों, पहली जब मेरे बाप का जनाज़ा उठा और दूसरी मेरी शादी की रात।"

- अश्-शेख़ अर-रईस अल-इमाम अबू अली हुसैन इब्न सीना (बू अली सीना)

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सख़ावत (उदारता) की एक बेमिसाल मिसाल: नवाब मुज़फ़्फ़र अली ख़ान
लेख

सख़ावत (उदारता) की एक बेमिसाल मिसाल: नवाब मुज़फ़्फ़र अली ख़ान

नाम भी मुज़फ़्फ़र था और रहते भी मुज़फ़्फ़रनगर में थे... पूरा नाम था "नवाब मुज़फ़्फ़र अली ख़ान"। मुज़फ़्फ़रनगर हिंदुस्तान में एक ज़िला है, उन भले दिनों में यह नवाब साहब की जागीर थी। नवाब साहब को इमारतें बनवाने (تعمیرات) का शौक़ था। इसी शौक़ को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने एक बहुत बड़े बाग़ के बीचों...