एक बादशाह की चार बीवियाँ थीं, बादशाह चारों से बहुत ज़्यादा म...
Ummah Post
30 October, 2026

एक बादशाह की चार बीवियाँ थीं, बादशाह चारों से बहुत ज़्यादा मोहब्बत करता था मगर चौथी बीवी उसकी नूर-ए-निगाह (आँखों का तारा) थी, बादशाह अपनी चौथी बीवी के लिए बेशक़ीमती तोहफ़े लाता और बाक़ी बीवियों से बढ़कर उसकी तरफ़ अपना झुकाव रखता, बादशाह की तीसरी बीवी इंतिहाई ख़ूबसूरत थी और बादशाह हमेशा दरबार में उसको अपने साथ तख़्त पर बैठाता था।

बादशाह की दूसरी बीवी समझदार, बुर्दबार (सहनशील), मेहरबान और तहम्मुल (धैर्य) वाली ख़ातून (महिला) थी और बादशाह जब भी किसी मुश्किल से दोचार होता तो अपनी दूसरी बीवी से मशवरा करता और उसके मशवरों से फ़ायदा हासिल करता।

बादशाह की पहली बीवी इंतिहाई वफ़ादार ख़ातून थी उसका बादशाह की सल्तनत हासिल करने और बादशाह बनने में एक बड़ा किरदार था मगर बादशाह उसे नज़रअंदाज़ कर दिया करता था और कभी उसके किसी काम की तारीफ़ नहीं की थी।

फिर एक रोज़ बादशाह बीमार पड़ गया और बीमारी इतनी बढ़ गई कि उसे अपनी दुनिया से जाने का वक़्त क़रीब नज़र आने लगा, बादशाह बोला "मैं कैसा बादशाह हूँ?, मेरी चार बीवियाँ हैं और जब मैं मरूँगा तो मैं तनहा मरूँगा, फिर वह अपनी चौथी बीवी से बोला "मेरी नूर-ए-नज़र मैं मरने वाला हूँ मैं चाहता हूँ तुम भी मेरे साथ चलो ताकि क़ब्र की तनहाई में मेरा साथ दे सको।

चौथी बीवी ने बादशाह की बात सुनकर मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया और फिर कमरे से बाहर चली गई, दूसरी दफ़ा बादशाह ने अपनी तीसरी बीवी से यही दरख़्वास्त की मगर उसने भी साथ चलने से इनकार कर दिया।

दोनों बीवियों की ऐसी सर्द-मेहरी (बेरुख़ी) देखकर बादशाह का दिल डूबने लगा तो उसने दूसरी बीवी से साथ चलने की दरख़्वास्त की, दूसरी बीवी बोली "बादशाह सलामत आप ख़ुद ही तो फ़रमाते हैं मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता लिहाज़ा यह मंज़िल आपको तनहा ही पार करनी पड़ेगी"।

तीनों बीवियों के बाद बादशाह को चौथी (पहली) बीवी की आवाज़ सुनाई दी "मैं आपके साथ चलूँगी जहाँ भी आप जाएँगे मैं साथ दूँगी", बादशाह ने गर्दन चौथी (पहली) बीवी की तरफ़ घुमाई जो इंतिहाई लाग़र (कमज़ोर) और ज़र्द (पीली) नज़र आ रही थी बादशाह ने इंतिहाई रंजीदा (दुखी) लहजे में उससे कहा "मेरी जान-ए-नज़र हाय सद-अफ़सोस काश मैंने तुम्हारा ख़याल उस वक़्त रखा होता जब मेरे क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में इख़्तियार था, यह कहकर बादशाह का सर एक तरफ़ गिर गया और वह इस दार-ए-फ़ानी (नश्वर दुनिया) से कूच कर गया।

हक़ीक़त यह है कि यह कहानी हर इंसान की ज़िंदगी की अक्कासी करती है (झलक दिखाती है) हर इंसान की ज़िंदगी में चार बीवियाँ होती हैं, चौथी बीवी उसका जिस्म है जिसको तवाना (ताक़तवर) रखने के लिए वह सारी ज़िंदगी कोशिश करता है मगर एक दिन उसे यह जिस्म छोड़ना पड़ता है।

तीसरी बीवी उसका माल और मंसब (पद) है और मरने पर यह भी छूट जाता है और दूसरों में तक़सीम हो (बँट) जाता है, दूसरी बीवी, अज़ीज़ रिश्तेदार व दोस्त-अहबाब हैं जो इंसान के मरने के बाद क़ब्र तक उसका साथ देते हैं और फिर वापस अपनी आरज़ी (अस्थायी) ज़िंदगी की तरफ़ लौट जाते हैं।

पहली बीवी इंसान की रूह है और सारी ज़िंदगी ख़ूबसूरत जिस्म हासिल करने की चाहत, दौलत व शौकत हासिल करने की आरज़ू और अज़ीज़ रिश्तेदार व दोस्तों की महफ़िल हमें इसकी तरफ़ ग़ौर करने का वक़्त नहीं देती और जब हमें इसकी ज़रूरत पड़ती है तब तक यह ज़ईफ़ व लाग़र (बूढ़ी और कमज़ोर) हो चुकी होती है।।

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