ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन (हे फ़िलिस्तीन की भूमि)!

तू जादा-ए-"...
Ummah Post
9 April, 2025

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन (हे फ़िलिस्तीन की भूमि)!

तू जादा-ए-"वात्तूर" (तूर पर्वत का रास्ता) है, तू मन्बा-ए-"वात्तीन" (अंजीर का स्रोत) है,

कंदा तेरे सीने पे हैं क़ुरआँ के मजामीन (विषय)।

भूले न तुझे मूसा व ईसा के फ़रामीन (आदेश),

खादिम तेरी चौखट के हैं दुनिया के सलातीन (राजा)।

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

दामन में तेरे हैं शब-ए-असरा (मेराज की रात) की बहारें,

"रफ़रफ़" (आकाशीय सवारी) को मलाईक (फ़रिश्ते) तेरी बस्ती में उतारें।

हाज़िर तेरी आगोश (गोद) में नबियों की क़तारें,

अक़्सा से है गर्दों (आसमान) तलक आवाज़ा-ए-यासीन।

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

क्यों आज फ़िलिस्तीन में वहशत (खौफ) का समाँ है?

क्यों ग़ज़ा में मातम-कदा (शोक गृह) हर एक मकां है?

क्यों तुझ को मिटाने पे तुला सारा जहाँ है?

क्यों तेरे लिए दहर (समय/दुनिया) के हालात हैं संगीन?

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

खूनख्वार दरिंदे तेरा दिल नोच रहे हैं,

टुकड़े तेरी गलियों में जवानों के पड़े हैं।

बच्चों के कलेजो (लाशों) से मकानात भरे हैं,

बारूद हवाओं में, ज़मीं खून से रंगीन।

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

अब जाग उठे हैं तेरे जाँबाज़ जियाले,

हाथों में फ़िलिस्तीन के परचम (झंडे) को संभाले।

सर कुफ़्र के ताग़ूत (शैतान/अहंकार) का ठोकर पे उछाले,

अब मस्जिद-ए-अक़्सा कभी होगी नहीं ग़मगीन।

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

ऐ काश कि लश्कर यहाँ अतराफ़ (चारों तरफ) से आएँ,

तकबीर के नारे तेरी मस्जिद में लगाएँ।

सर, अर्ज़-ए-मुक़द्दस (पवित्र भूमि) तेरी हुरमत (सम्मान) पे कटाएँ,

फिर कुफ़्र के पंजों से तू आज़ाद हो, आमीन!

ऐ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीन!

कलाम: जुनैद अश्फ़ाक़ अत्तकी

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