अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातूह।

अरकान-ए-आमिला (क...
Ummah Post
25 March, 2025

अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातूह।

अरकान-ए-आमिला (कार्यकारिणी समिति) के तमाम अहबाब (मित्र/सदस्य) बफ़ज़्ल-ए-तआला (अल्लाह की कृपा से) बखैर होंगे। अल्लाह तआला हम सब को माह-ए-मुबारक (रमज़ान) के आख़िरी अशरे की तमाम खुसूसियात (विशेषताओं) और फ़ज़ाइल (पुण्यों) को मसनून तरीक़े (सुन्नत के अनुसार) पर हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

दीगर अहवाल (अन्य विवरण) यह है कि ऊपर जो ऐप्स (Apps) नज़र आ रही हैं, आप शायद समझें कि यह बहुत मुफ़ीद (उपयोगी) और कारआमद हैं और यह मुसलमानों के तैयार कर्दा हैं। अगर आप ऐसा समझ रहे हैं, तो यह मुकम्मल तौर पर दुरुस्त नहीं है, क्योंकि यह ऐप्स दरहक़ीक़त क़ादियानियों की तख़्लीक़ कर्दा (बनाई हुई) हैं, जो इस्लाम का लिबादा ओढ़कर मुसलमानों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। यह अफ़राद (लोग) खुद को अहमदिया मुस्लिम कम्युनिटी, अहमदिया मुस्लिम जमात, या अहमदिया मुस्लिम मिशन के नाम से मुतआरिफ़ (परिचित) कराते हैं और भारत सहित दुनिया भर में सरगर्म (सक्रिय) हैं।

ऊपर 20 ऐप्स का ज़िक्र किया गया है, जिनमें से हर एक का अपना एक इतिहास और बैकग्राउंड है। यहाँ "Ask Islam" ऐप पर चंद ज़रूरी बातें पेश की जा रही हैं, बाक़ी ऐप्स के बारे में इन शा अल्लाह आइंदा वज़ाहत (स्पष्टीकरण) की जाएगी।

"Ask Islam" ऐप क्या है?

यह ऐप दरअसल एक दारुल-इफ़्ता की शक्ल में काम कर रही है। जैसा कि हम जानते हैं, दारुल-इफ़्ता का काम क़ुरआन व हदीस की रोशनी में सवालों के जवाब देना होता है। बिल्कुल इसी तर्ज़ पर यह क़ादियानी ऐप भी इस्लाम के नाम पर फ़तावे जारी करती है, लेकिन उनके जवाब क़ादियानी अक़ाइद (मान्यताओं) पर मबनी (आधारित) होते हैं, जो सरासर गुमराही है।

अब सवाल यह है कि क्या इस ऐप पर सिर्फ़ क़ादियानी सवाल करते हैं?

नहीं! बल्कि ज़्यादातर मुसलमान ही इस ऐप से रुजू करते हैं (जुड़ते हैं), क्योंकि वे इसे एक मुस्तनद (प्रामाणिक) इस्लामी ऐप समझ बैठे हैं। मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स विरासत या वसीयत से मुतअल्लिक़ (संबंधित) सवाल पूछता है, तो उसे क़ादियानी अक़ाइद के मुताबिक़ जवाब दिया जाता है, और बदक़िस्मती से वह इसे दुरुस्त समझकर क़बूल कर लेता है।

नौजवानों की ला-इल्मी (अज्ञानता) और ख़तरा

हमारे नौजवानों की एक आम आदत यह बन चुकी है कि वे उलेमा-ए-केराम और आइम्मा-ए-मसाजिद (मस्जिदों के इमामों) से रुजू करने के बजाय "इमाम गूगल" पर भरोसा करते हैं। हद तो यह है कि बच्चे के पैदा होने पर उसका इस्लामी नाम रखने के लिए उलेमा या मसाजिद के इमाम से मशवरा लेने के बजाय, गूगल या ऑनलाइन ऐप्स से रुजू किया जाता है। इसके नतीजे में रिवायती (पारंपरिक) और मुस्तनद इस्लामी नाम जैसे अब्दुल्लाह, अब्दुल रहमान, फ़ातिमा और आयशा को दक़ियानूसी (पुराने ख़यालात का) समझा जाने लगा है। इस मसले पर भी इन शा अल्लाह किसी और मौक़े पर तफ़्सील (विस्तार) से गुफ़्तगू की जाएगी।

यह नौजवान मुसलमानों के घरों में रहते हुए भी ज़ेहनी तौर पर क़ादियानियत की तरफ़ माईल (आकर्षित) हो रहे हैं, लेकिन उन्हें खुद इस बात का अंदाज़ा नहीं, और उनके वालिदैन (माता-पिता) भी इस ख़तरे से बेख़बर हैं। यह सूरत-ए-हाल (स्थिति) निहायत ख़तरनाक है!

क़ाफ़िले का लुट जाना नुक़सानदेह तो है ही, लेकिन लुट जाने का एहसास तक न होना सबसे बड़ा नुक़सान है।

क़ादियानियों की मकारी और तदबीर (रणनीति)

क़ादियानी अपने ऐप्स के नाम "क़ादियानी ऐप्स" या "अहमदिया ऐप्स" रखने के बजाय "अल-इस्लाम" जैसे नामों से उन्हें लॉन्च करते हैं ताकि मुसलमानों को धोखा दे सकें।

लिहाज़ा ज़रूरी है कि:

1. आइम्मा-ए-मसाजिद जुमे के ख़िताबों, ताक़ रातों के दरूस (पाठों) और ईदगाह में होने वाले इज्तिमाआत (सभाओं) में इस फ़ितने (कुप्रथा) के बारे में मुसलमानों को ख़बरदार करें।

2. आवाम (जनता) को बताया जाए कि यह ऐप्स इस्लाम के नाम पर क़ादियानियत का ज़हर फैलाने का एक ज़रिया (माध्यम) हैं।

3. मुसलमान इन ऐप्स के इस्तेमाल से गुरेज़ (परहेज) करें और मुस्तनद इस्लामी इदारों (संस्थानों) से रुजू करें।

यह न समझें कि क़ादियानी हमारे दरमियान नहीं हैं, बल्कि उनका ज़हरीला प्रोपेगैंडा हर मुसलमान की जेब में "ऐप्स" की सूरत में मौजूद है।

मौदबाना गुज़ारिश (विनम्र निवेदन) है कि इस फ़ितने की हस्सासियत (संवेदनशीलता) और संगीनी (गंभीरता) को समझें और फ़ौरी तौर पर इसके सद्-ए-बाब (रोकथाम) की तदबीरें इख़्तियार करें।

अल्लाह तआला हम सब को दीन की हिफ़ाज़त की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और इस मुबारक ख़िदमत में ज़िंदगी की आख़िरी सांस तक इख़्लास (निष्ठा) और इस्तिक़ामत (दृढ़ता) अता करे। आमीन।

दुआओं का तलबगार,

अब्दुल रहमान, मेलविशारम, सूबा तमिलनाडु

22 रमज़ान-उल-मुबारक 1466 हिजरी

23 मार्च 2025, दोपहर 1 बजे

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