मलफ़ूज़: भोला होना कमाल नहीं
*मलफ़ूज़ात-ए-हकीम-उल-उम्मत मुजद्दिद-उल-मिल्लत हज़रत मौलाना मोहम्मद अशरफ़ अली थानवी रहमतुल्लाह अलैह*
*भोला होना कमाल नहीं*
इरशाद फ़रमाया कि ख़ूब समझ लो कि बुज़ुर्गों में ज़्यादा कामिल वो है जिसकी हालत नबी ﷺ के ज़्यादा मुशाबेह (समान) हो। सो कोई नबी भोला नहीं हुआ, जितने नबी हुए हैं सब निहायत होशियार और बेदार-मग़्ज़ (सतर्क) थे। पस ज़्यादा कामिल वही होगा जो निहायत होशियार हो, भोला होना कोई कमाल नहीं, भोला आदमी भी समझेगा किसी के मक्र (धोखे) को? जब इंसान ही के मक्र को न समझेगा तो शैतान के मक्र को क्या ख़ाक समझेगा क्योंकि शैतान का मक्र तो इंसान के मक्र से ज़्यादा सख़्त है। यूं वज़ीफ़ा पढ़ना और बात है, बाक़ी तरबियत जिसका नाम है ये भोले शख़्स से नहीं हो सकती। तरबियत और इस्लाह (सुधार) दूसरों की वही कर सकता है जो निहायत होशियार और बेदार-मग़्ज़ हो, लिहाज़ा बैअत भी इंतख़ाब (चुनकर) करके ऐसे ही शख़्स से करनी चाहिए।
(३१३ अशरफ़ी जवाहरात, सफ़ा २२)