*"इक़रा बिस्मी रब्बिका"* (पढ़ अपने रब के नाम से) का इख़्तिताम (अंत) *"वस्जुद वक़्तरिब"* (और सज्दा कर और क़रीब हो जा) पर होता है। जिस पढ़ाई का नतीजा क़ुर्ब-ए-इलाही (अल्लाह की नज़दीकी) न हो, वो इस्लाम का मन्शा (उद्देश्य) नहीं है...
*📝 तअम्मुलात-ए-क़ुरआनिया (क़ुरआनी चिंतन)*