*मल्फ़ूज़ात (कथन) हकीम-उल-उम्मत मुजद्दिद-उल-मिल्लत हज़रत मौल...
Ummah Post
3 December, 2024

*मल्फ़ूज़ात (कथन) हकीम-उल-उम्मत मुजद्दिद-उल-मिल्लत हज़रत मौलाना मोहम्मद अशरफ़ अली थानवी रहमतुल्लाह अलैह*

*बुजुर्गों (बड़ों/मार्गदर्शकों) के पास रहने ही में सलामती है*

इरशाद फ़रमाया कि आज एक ख़त आया है। लिखा है कि जी चाहता है कि महज़ अल्लाह की रज़ा के वास्ते चालीस रोज़े रखूँ और ऐसी जगह रहूँ जहाँ कोई न आवे। इसका यह जवाब दिया गया कि दो चीज़ें इसकी मानिक (बाधा) हैं: एक मशक़्क़त नाक़ाबिले-तहम्मुत (असहनीय कठिनाई) दूसरे शोहरत (प्रसिद्धि), इसको देख लिया जाए। फिर फ़रमाया कि इसकी ज़रूरत ही क्या है? न मालूम लोग मख़्लूक़ (इंसानों) से नफ़रत क्यों करते हैं? क्या कोई खाए लेता है। इसका नतीजा यह होगा कि बुज़ुर्ग मशहूर हो जाएँगे कि चिल्ला खींच रहे हैं और यह बड़ा फ़ितना (परीक्षा/विपदा) है। एक दफ़ा फ़लाँ मौलवी साहब ने मुझसे कहा था कि जी चाहता है कि गुमनाम जगह में रहूँ जहाँ कोई न पहचानता हो। मैंने कहा कि इसकी ज़रूरत ही क्या है, अपने बड़ों के पास रहने में भी कौन पहचानता है, अगर अलग रहोगे तो बुज़ुर्ग मशहूर हो जाओगे जो बड़ा फ़ितना है। ख़ैर (भलाई) इसी में है कि अपने बुज़ुर्गों के पास पड़े रहो।

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रश्क के क़ाबिल एक वाक़िया
लेख

रश्क के क़ाबिल एक वाक़िया

एक तुर्क मुसलमान मस्जिद-ए-नबवी शरीफ़ के अहाते (प्रांगण) में खड़े होकर अपना आँखों देखा वाक़िया इस तरह बयान करता है: मैं मस्जिद-ए-नबवी में खड़ा देख रहा था कि चार पुलिसवाले किसी का इंतज़ार कर रहे हैं। फिर एक शख़्स नमूदार (प्रकट) हुआ तो पुलिसवालों ने भागकर उसे क़ाबू में कर लिया और उसके हाथ जकड़ लिए।...