अगर किसी ख़ैमे (तंबू) पर लिखा हो 'ख़ैमा-ए-लैला' लेकिन उसमें झांक कर देखा तो अंदर कुत्ता बंधा हुआ है, तो उस ख़ैमे की कोई क़द्र नहीं होगी बल्कि लोग मज़ाक़ उड़ाएंगे। इसी तरह मौलवी वह है जो मौला (अल्लाह) वाला हो, उसके ख़ैमा-ए-महमिल (निवास) से ख़ुशबू-ए-मौला मिलनी चाहिए, यानी उसकी सोहबत (संगति) में अल्लाह की मोहब्बत की ख़ुशबू आनी चाहिए; उसकी सोहबत से अल्लाह की मोहब्बत पैदा हो और दुनिया की मोहब्बत दिल से निकले। चुनांचे, जो अल्लाह वाले मौलवी हैं उनकी ख़ुशबू से एक आलम (पूरी दुनिया) मस्त होता है, ऐसे ही अल्लाह वाले उलेमा (विद्वानों) से दीन फैला है और हमारे तमाम अकाबिर (बुजुर्ग) इसकी मिसाल हैं। लेकिन जो मौलवी अल्लाह वालों से मुस्तग़नी (बेपरवाह) रहते हैं और अपने नफ़्स (अहंकार) को नहीं मिटाते, और आवाम (जनता) उनको मौला वाला समझ कर उनके पास आते हैं, लेकिन जब देखते हैं कि उनके ख़ैमे में तो हुब्ब-ए-दुनिया (दुनिया का लालच) और हुब्ब-ए-जाह (पद-प्रतिष्ठा की चाह) का कुत्ता बंधा हुआ है और मौला नदारद (नदारद/ग़ायब) हैं, तो बहुत मायूस होते हैं। आज-कल अहल-ए-इल्म (विद्वानों) की बेक़द्री इसी सबब (कारण) से है, वरना जो उलेमा अहलुल्लाह् (अल्लाह वालों) के सोहबत-याफ़्ता (संगति प्राप्त) हैं, मख़्लूक (जनता) आज भी उन पर फ़िदा है।
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