*इसे साझा (शेयर) करके आप बहुत से लोगों को बचा सकते हैं*

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Ummah Post
22 November, 2024

*इसे साझा (शेयर) करके आप बहुत से लोगों को बचा सकते हैं*

मेरा एक इबरतनाक (सबक सिखाने वाला) वाकया

लेखक: बदरुल इस्लाम कासमी

उस्ताद (शिक्षक), जामिया इमाम मोहम्मद अनवर शाह, देवबंद

मैं आमतौर पर बहुत निजी किस्म के मामलों, तस्वीरों या घटनाओं को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने का कायल (पक्षधर) नहीं हूं। हालांकि, अगर कोई ऐसा वाकया पेश आए जिसमें कोई सबक हो, शुक्रगुज़ारी का मौका हो, हौसला बढ़ाने वाली बातें हों, या दोस्तों की दुआएं चाहिए हों, तो उसे ज़रूर शेयर करता हूं।

ऐसा ही एक वाकया कल बीते सोमवार, दिनांक 18 नवंबर 2024 को मेरे साथ पेश आया।

दोपहर लगभग डेढ़ बजे मैं 'नूर ग्राफिक्स' में कुछ काम कर रहा था। दोनों बच्चे पढ़ने के लिए घर से निकले तो मैंने सोचा कि ऊपर जाकर खाना खा लिया जाए। ऊपर आया तो तीन साल का छोटा लड़का आंगन के बीच में झूला झूल रहा था। वालिदा साहिबा (माता जी) थोड़ी दूरी पर स्थित अपने कमरे में थीं। अहलिया (पत्नी) नज़र नहीं आईं तो मैं अपने निजी कमरे की तरफ बढ़ा। उससे बिल्कुल सटे हुए गुसलखाने (बाथरूम) में से किसी के हांपने और ज़ोर-ज़ोर से सांस लेने की आवाज़ आती महसूस हुई। मैंने अहलिया का नाम लेकर पुकारा, हल्के से दरवाज़े पर दस्तक दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला और वह आवाज़ वैसी की वैसी ही आती रही। मेरा माथा ठनका और मैंने दरवाज़ा तोड़ने के लिए कई बार अपने कंधे से उस पर ज़ोर लगाया। पांच-छह वार के बाद दरवाज़ा टूटा तो अहलिया को एक कोने में बेहोश पाया। चीख-चीख कर वालिदा को पुकारा। अहलिया बिल्कुल बेहोश थीं, आंखों की हालत बयान से बाहर थी, दांत से दांत भिंचे हुए थे। कुछ समझ नहीं आया, ऐसा लगा जैसे सिर पर कयामत आ खड़ी हुई हो। बड़ी मुश्किल से वालिदा के साथ मिलकर उन्हें गुसलखाने से बाहर निकाला। डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर की तरफ भागा, ज़ुबान पर अल्लाह तआला का नाम जारी था और आंखें किसी मददगार डॉक्टर को तलाश कर रही थीं। घर से सटे हुए दोनों डॉक्टर क्लीनिक पर नहीं थे। थोड़ी दूर पर स्थित एक डॉक्टर साहब को कॉल की तो वह भी घर से काफी फासले पर थे। नदीम भाई (मैनेजर, मकतबा अन-नूर) को मोहल्ले के एक दूसरे डॉक्टर साहब को लेने भेजा तो वह भी किसी इमरजेंसी केस को देख रहे थे। फिर तुरंत उन्हें दारुल उलूम वक्फ के पास स्थित 'राज़ी क्लीनिक' भेजा, जहां मेरे मरहूम उस्ताद हज़रत मौलाना ग़ुलाम नबी कश्मीरी (रहमतुल्लाह अलैह) के साहबज़ादे डॉक्टर सलमान वली खिदमत अंजाम देते हैं। दरवाज़ा तोड़ने से लेकर अब तक लगभग पंद्रह मिनट हो चुके थे। अहलिया की सांस चल रही थी लेकिन बोलने की ताक़त नहीं थी। कुछ देर में उनके होश लौटने शुरू हुए, हल्के-हल्के होंठ हिलने लगे, जैसे कुछ कहना चाहती हों। मैंने कान लगाकर सुनने की कोशिश की तो वह 'कलमा तैयबा' का विर्द (पाठ) कर रही थीं, साथ ही कह रही थीं कि "मेरी गलतियां माफ करना"। मैं और वालिदा साहिबा उन्हें लगातार तसल्ली देते रहे। वालिदा पढ़ा हुआ (दम किया हुआ) पानी ले आईं और वह पिलाया। इतने में डॉक्टर सलमान वली साहब भी आ पहुंचे और तुरंत बीपी और ऑक्सीजन लेवल वगैरह चेक किया, तसल्ली दी और इंजेक्शन लगाए।

उन्होंने बताया कि गुसलखाने के अंदर गैस गीज़र होने की वजह से ऑक्सीजन खत्म हो रही थी, जिसके कारण उन पर बेहोशी (ग़शी) तारी हुई। आप इत्मीनान रखें, एक-दो दिन में मुकम्मल (पूरी तरह) सेहतमंद हो जाएंगी, इंशाअल्लाह।

यह आधा घंटा मेरी ज़िंदगी के सबसे सख्त तरीन (मुश्किल) लम्हों में से था। अल्लाह का लाख-लाख फज़्ल (कृपा) रहा, मैं जितना भी उस रहीम और करीम का शुक्र अदा करूं, वह कम है।

इस वाकये से मालूम हुआ कि किसी भी सूरत में गैस गीज़र गुसलखाने (बावायरमेंट) के अंदर नहीं लगवाना चाहिए। खुदा न खास्ता यह किसी बड़े हादसे का सबब (कारण) बन सकता है, इस तरह के और भी बहुत से वाकयात सुनने में आ चुके हैं।

अल्लाह के फज़्ल-ओ-करम से अहलिया मोहतरमा अब सेहतमंद हो रही हैं (ठीक हो रही हैं), दोस्तों से और दुआओं की गुज़ारिश है। जज़ाकमुल्लाह खैरा।

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लेख

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