रात के तक़रीबन साढ़े बारह बज रहे थे। मैं अपने बिस्तर पर लेटा...
Ummah Post
11 January, 2024

रात के तक़रीबन साढ़े बारह बज रहे थे। मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। नींद आँखों से कोसों दूर थी। बज़ाहिर (स्पष्ट रूप से) मेरी आँखें बंद थीं मगर मैं पूरी तरह जाग रहा था। आँखें मूंदे हुए करवट बदल-बदल कर मैं थक चुका था। बेख़्याली में मेरी आँखें यकलख़्त (अचानक) खुल गईं। सामने अलमारी पर मेरी बहुत सी किताबें तरतीब (क्रम) से रखी हुई थीं। कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था। सिर्फ़ घड़ी की सुई चलने की आवाज़ आ रही थी। मेरी नज़रें बहुत देर तक उस अलमारी पर टिकी रहीं और मैं अपने माज़ी (अतीत) में खो गया।

वह मेरा तालिब-ए-इल्मी (छात्र जीवन) का ज़माना था और मैं बोर्डिंग में क़ियाम पज़ीर (रहा करता) था। मुझे उस वक़्त किताबों का जुनून सवार था। दरसी (पाठ्य) किताबों के बाद ख़ाली औक़ात (समय) में ग़ैर-दरसी (अन्य) किताबें पढ़ना मेरा मश्ग़ला (शौक) बन गया था। छुट्टी के बाद जब सारे बच्चे खेलने चले जाते तो मैं किताबें लिए कमरे में बैठ जाता, यहाँ तक कि मग़रिब की अज़ान हो जाती। मेरे दोस्त जब भी मुझे कहीं चलने को कहते तो मैं इंकार कर देता।

वक़्त कम होता था मगर मेरी लगन यह थी कि किताबें कम पड़ जाती थीं। मैं किताबें ढूंढ-ढूंढ कर लाता। पैसे कम होते थे इसलिए मैंने लाइब्रेरी तलाश करनी शुरू कर दी।

शाम का वक़्त था; घनी बाज़ार से होते हुए मैं एक सुनसान सड़क पर आ चुका था जो मेरी मतलूबा (वांछित) जगह थी। कुछ दूर चलकर एक पतली सी सड़क नज़र आई, दहाने (मुहाने) पर लाइब्रेरी का बोर्ड लगा देखकर मेरी ख़ुशी की इंतेहा न रही। उस रोज़ मैंने वहाँ से बहुत सी किताबें लीं। अब मैं हफ़्ते में दो-तीन बार लाइब्रेरी जाता और किताबें लाकर पढ़ता। जुमेरात (गुरुवार) को जब घर जाना होता, तो बुध की शाम ही किताबों का इंतेज़ाम कर लेता। मेरी देखा-देखी और दोस्तों ने भी किताबें पढ़ना शुरू कर दिया था। सिलसिला चलता रहा और देखते ही देखते साल गुज़रने के क़रीब आ गया मगर मैं इससे बेपरवाह था। स्कूल छोड़ने के बाद भी मेरा मुताले (अध्ययन) का शौक़ जारी रहा।

तभी घड़ी ने मुझे झंझोड़ते हुए एक बजने का ऐलान कर दिया। मेरी आँखें अब भी किताबों की अलमारी पर टिकी हुई थीं लेकिन मैं तख़य्युलात (कल्पनाओं) के समंदर से निकल चुका था। अलमारी पर तरतीब से किताबें खड़ी थीं, जिन्हें मैं बहुत शौक़ से ख़रीद कर लाया था। और दो-तीन साल गुज़र जाने के बाद भी कभी पढ़ने के लिए नहीं उठाया था।

नई किताबों के साथ-साथ बहुत सी किताबें ऐसी भी थीं जो अपने सरवरक़ (टाइटल कवर) से महरूम (वंचित) हो चुकी थीं। मैं उन्हें ग़ौर से देखने लगा। कुछ औराक़ (पन्ने) किताब से अलैहिदा (अलग) होकर अलमारी से लटक रहे थे। ज़रा देर के लिए मेरे दिल में हमदर्दी पैदा हुई और मैं उठने ही वाला था कि उन्हें दुरुस्त करूँ, मगर अचानक ऐसा लगा जैसे औराक़ चीख़ पड़े हों।

"मियाँ रहने दो... रहने दो हमें... हमारी इस ख़स्ताहाली का तुम्हें आज ख़्याल आया... अरे तुम वही हो ना जो हमसे मोहब्बत का दम भरा करते थे... और हाँ तुम क्या कहते थे, 'हमको किताबों से बहुत मोहब्बत है, किताबें मेरी दोस्त हैं, किताबों के बग़ैर मुझे नींद नहीं आती'। अरे ओ बेवफ़ा इंसान! तुम्हें क्या हो गया, तुम तो ऐसे न थे। हमें इस तरह रखकर सालों-साल के लिए तू हमसे बेपरवाह हो गया। क्या तुमने हमें नमूद-ओ-रियाकारी (दिखावे) के लिए रखा है? क्या तू चाहता है कि तुम्हारे दोस्त व अहबाब अलमारी पर हमें रखा देखकर तुम्हें एक अच्छा और बाज़ौक़ (अच्छी पसंद वाला) क़ारी (पाठक) तसव्वुर (स्वीकार) करें? तुम्हें एक पढ़ा-लिखा आदमी समझें?..."

चीख़ते-चीख़ते उन औराक़ की आवाज़ पर लर्ज़ा (कँपकँपी) तारी हो गया था, लेकिन फिर भी एक बेबस मज़लूम की तरह मज़ीद (और) कहना शुरू किया।

"नहीं नहीं... हरगिज़ नहीं तुम ऐसे नहीं हो सकते... तुम्हें अब किताबों से बिल्कुल भी मोहब्बत नहीं। तुम्हें तो अब इंटरनेट से मोहब्बत हो गई है। तुम तो अब इंटरनेट के बग़ैर एक पल भी नहीं रह सकते। तुम्हारे तकिये की वह जगह जहाँ तुम कभी मोहब्बत से हम किताबों को रखा करते थे, आज वह जगह तुमने इंटरनेट के इस मल्टीमीडिया मोबाइल को दे रखी है। हाँ... हाँ अभी भी तुम्हारे सिरहाने मोबाइल रखा हुआ है। ख़ुदारा (भगवान के लिए) अब तुम हमसे मोहब्बत के दम भरना छोड़ दो..."

आवाज़ की लर्ज़िश (कंपन) में वो औराक़ और न जाने क्या-क्या कहते गए। मेरी निगाहें अब भी उस अलमारी पर टिकी हुई थीं। हक़ीक़त न होने के बावजूद भी वह मंज़र मुझे हक़ीक़ी तौर पर नज़र आ रहा था। वो औराक़ मेरे शब-ओ-रोज़ (दिन-रात) की तल्ख़ हक़ीक़त को बयान करते-करते ख़ामोश हो चुके थे। मैंने एक बार फिर कोशिश की, लेकिन इससे पहले कि मैं उन्हें दुरुस्त करने के लिए उठता, नमदीदा (नम/आंसुओं से भीगे) औराक़ ख़ुद-ब-ख़ुद किताबों में सिमट गए और किताबें रो पड़ीं।

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लेख

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