मय्यत (शव) कंधों पर बाद में उठती है; देग (बड़े बर्तन) में चमचे पहले खड़क जाते हैं। शोकाकुल परिवार की दहाड़ें कम नहीं होतीं कि "मसाला पकड़ा ओए" की आवाजें बुलंद हो जाती हैं। कब्र पर फूल सजते नहीं कि खाने के बर्तन सज जाते हैं। आंखों में आंसू खुशक (सूख) नहीं पाते कि अज़ीज़-ओ-अकारिब (सगे-संबंधियों) के लहजे पहले ही खुशक हो जाते हैं... "चावलों में बोटियां बहुत कम हैं। फलां ने रोटी दी थी तो क्या गरीब थे जो दो किलो गोश्त और डाल देते।" मरने वाला तो चला जाता है। लेकिन यह कैसा रिवाज है कि जनाज़ा पढ़ने के लिए आने वाले उसकी याद में बोटियों को चख मारते (चबाते) देगी खाने के स्वाद के इंतज़ार में होते हैं? इन दकियानूसी (فرسودہ) रस्मों को बदलो। यह क्या तरीका है कि जनाज़े पर भी जाओ तो "रोटी खा के आना?" आस-पास की तो बात ही न करें; दूर से आए हुए लोगों को भी चाहिए कि अगर ज्यादा भूख लगी है तो किसी होटल से खा लिया करें। यह तय (संकल्प) कर लें कि भविष्य में अगर कभी किसी जनाज़े में शामिल होना पड़े, चाहे हजार किलोमीटर का सफर करके क्यों न जाएं, और चाहे अज़ीज़-ओ-अकारिब ही क्यों न पकाएं, मय्यत वाले घर से खाना नहीं खाना है। खुशी और गमी हर इंसान के साथ है। लेकिन रस्मों को बदलें, इससे पहले कि हमारा सामाजिक ताना-बाना (معاشرती نظام) ही इसकी लपेट में आ जाए...
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