कुछ इस तरह से मेरी ज़िन्दगी की गुज़र हुई,
हमेशा तेरी इबादतों से ग़ाफ़िल (बेखबर) रही।
अहकाम-ए-इलाही (ईश्वर के आदेशों) से मुँह फेरे रही,
सुन्नत-ए-नबवी (ﷺ) को पस-ए-पुश्त (पीछे) डालती रही।
मेरे अन्दर कोई भी दीन व इस्लाम की निशानी न रही,
क़ुरआन की तिलावत की कभी फ़िक्र न रही।
दिन और रात तेरी नाफ़रमानी में डूबी रही,
उक़्बा (परलोक/आख़िरत) की कभी फ़िक्र न रही।
दुनिया और इसकी हलाक (बर्बाद) कर देने वाली लज़्ज़त (सुख) को अपना सब कुछ समझती रही,
गुनाहों पर गुनाह करती रही,
दर-बदर ठोकरें खाती ही रही।
फिर एक दिन तेरे करम की बरसात हुई,
तूने मुझे अपना बनाया, तेरी तरफ मैं पेश हुई।
अपनी हर ख़ता (गलती) पर शर्मसार हुई,
अपने किए पर पशामान (शर्मिंदा) हुई।
ख़ुद को तेरे सामने झुकाती ही रही,
और फिर तूने मुझ नाकारा पर रहम ही रहम किया।
मेरी हर ख़ता को दरगुज़र (माफ़) किया,
मेरी हर कोताही व लग़्ज़िश (चूक) को माफ़ किया।
मेरे हर फ़ेल-ए-क़बीह (बुरे काम) को पोशीदा (छुपाकर) रखा,
मेरी हर जायज़ ख़्वाहिशात को तकमील (पूरा) किया।
कुछ इस तरह से तेरी रहमतों की बरसात हुई,
तू मेरा हुआ और मैं तेरी हुई।
अपने किए पे नादिम (शर्मिंदा) और तेरी इनायात पर शुक्र अदा करती ही रही।
ऐ अल्लाह! तेरे ही लिए तमाम तारीफें हैं, ऐसी तारीफ जो हमेशा रहने वाली है।
मैं अल्लाह से माफ़ी मांगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक नहीं, जो ज़िन्दा है और सबको संभालने वाला है, और मैं उसी की तरफ तौबा करता हूँ।
✍🏻...... बिन्त-ए-शमशीर 💦🤍