खुदी का फ़लसफ़ा सुन कर दुआएँ काँप उठती हैं,
चराग़-ए-दिल की हिद्दत (गर्मी) से हवाएँ काँप उठती हैं।
सलाख़ें अपने ज़िन्दाँ (क़ैदख़ाने) की ज़रा मज़बूत रखना तुम,
कि शाहीं (बाज़) फड़फड़ाए तो फ़ज़ाएँ काँप उठती हैं।
हमें सलीब पर चढ़ा करके भी बहुत मायूस होगे तुम,
हमारी मुस्कराहट पर सजाएँ काँप उठती हैं।
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— आबी मख्नवी