इब्न हुबैरह ने इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाह अलैह) को क़ाज़ी का पद (मंसब-ए-क़ज़ा) सौंपना चाहा, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इमाम अबू हनीफ़ा के इस इनकार पर उसने कसम खा ली कि अगर इमाम साहब ने क़ाज़ी का पद स्वीकार नहीं किया, तो मैं उन्हें कोड़े लगाऊँगा और फिर जेल में डाल दूँगा।
इमाम अबू हनीफ़ा ने उसके बार-बार प्रयास के बावजूद क़ाज़ी का पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इब्न हुबैरह ने इमाम अबू हनीफ़ा को इस कदर कोड़े लगवाए कि मार से आपका चेहरा और सिर सूज गया। इमाम अबू हनीफ़ा ने फ़रमाया:
(( الضَّرْبُ بِالسِّیَا طِ فِی الدُّنْیَا أَھْوَن عَلَیَّ مِنَ الضَّرْبِ بِمَقَاطِعِ الْحَدِیدِ فِی الآخِرَۃِ ))
"दुनिया में कोड़े खा लेना मेरे लिए इससे कहीं ज़्यादा आसान है कि आख़िरत (परलोक) में मुझे लोहे के गुर्ज (गदा) का सामना करना पड़े।"
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(१) इमाम अबू हनीफ़ा नुमान बिन साबित (रह.) बहुत बड़े आलिम-ए-दीन (इस्लामी विद्वान) और फ़क़ीह (न्यायविद) थे। वह ८० हिजरी / ६९९ ईस्वी में पैदा हुए। वह कूफ़ा में 'ख़ज़' (रेशमी कपड़ा) बनाते थे और उसका व्यापार करते थे। इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम हम्माद (रह.) के शागिर्द (शिष्य) थे। इब्न हुबैरह के बाद ख़लीफ़ा मन्सूर ने उन्हें क़ाज़ी बनाना चाहा मगर वह तैयार न हुए, तो मन्सूर ने १४६ हिजरी में उन्हें क़ैद कर दिया। उन्होंने बगदाद में क़ैद के दौरान ही १५० हिजरी / ७६७ ईस्वी में वफ़ात (मृत्यु) पाई। इमाम यूसुफ़, इमाम मोहम्मद और इमाम ज़ुफ़र आपके प्रसिद्ध शागिर्द थे।
(उर्दू दायरा-ए-माआरिफ़-ए-इस्लामिया, जिल्द १, पेज ७८३-७८४)