कलम मेरा क़ासिर (असमर्थ) है, अल्फ़ाज़ नहीं,
मैं क्या लिखूँ...
Ummah Post
7 November, 2024

कलम मेरा क़ासिर (असमर्थ) है, अल्फ़ाज़ नहीं,

मैं क्या लिखूँ ऐसी शख़्सियत के बारे में_____?

जो हर लम्हा हमें अपनी आगोश (गले) में रखते हैं_____

अपनी दुआओं में हमारी खुशियाँ और कामयाबी व कामरानी की दुआएं मांगते हैं______

रात के अंधेरे में जब सारी दुनिया सो रही होती है तो, ये हमारे हक़ में हलाल रिज़्क़ की बरकतें मांगते हैं___

जब हम ग़मगीन होते हैं तो सीने से लगाते हैं____

जब हम दर्द में मुब्तिला होते हैं तो खुद से ज़्यादा इनको परेशान देखते हैं____

इस फ़ानी (नश्वर) दुनिया में इस तरह से बेइंतहा और बेलोस (निःस्वार्थ) मोहब्बत करने वाली शख़्सियत सिर्फ़ और सिर्फ़ वालदैन (माता-पिता) हैं___

तो क्यों न हम कहें उनके हक़ में:

*रब्बिर हमहुमा कमा रब्बयानी सगीरा* (ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फरमा जैसा कि उन्होंने बचपन में मुझे पाला)

💓🤍💖🤲🏻✨

✍🏻.......बिन्ते शमशीर 🤍✨

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लेख

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