बहर-ए-ग़फ़्लत यह तेरी हस्ती नहीं,
देख जन्नत इस क़दर सस्ती न...
Ummah Post
By Mohd
3 December, 2020

बहर-ए-ग़फ़्लत यह तेरी हस्ती नहीं,

देख जन्नत इस क़दर सस्ती नहीं।

रहगुज़र दुनिया है यह बस्ती नहीं,

जाये-ऐश-ओ-इशरत-ओ-मस्ती नहीं।

इक दिन मरना है आख़िर मौत है,

करले जो करना है आख़िर मौत है।

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मुस्लिम उम्मत धर्मपरिवर्तन (इर्तिदाद) के कगार पर...!! (इर्तिदाद की तरफ ले जाने वाली एक नई साज़िश, अजीब खुलासा)
लेख

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जब तक तबलीगी जमात में निकलना नहीं हुआ था, तब तक इस काम की कोई खास अहमियत नहीं थी। बस यह सुनते थे कि अल्लाह के रास्ते में निकलो, ईमान की अहमियत मालूम होगी, लोगों के हालात का अंदाज़ा होगा, उम्मत दीन से कितनी दूर है, लोगों को कलमा नहीं आता वगैरह-वगैरह। यह सब बातें सुनते तो थे, लेकिन एक कान से सुनते और...