ज़िंदगी का ख़ुलासा (सार):
मोहतरम शेख़-उल-इस्लाम मुफ़्ती मोह...
Ummah Post
13 October, 2024

ज़िंदगी का ख़ुलासा (सार):

मोहतरम शेख़-उल-इस्लाम मुफ़्ती मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब से सवाल किया कि, "हज़रत ज़िंदगी का ख़ुलासा क्या है?"

हज़रत ने ये 20 नुकात (बिंदु) इरशाद फ़रमाए:

(1) हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा किया करो।

(2) कोशिश करो कि पूरी ज़िंदगी में कोई तुम्हारी शिकायत किसी दूसरे इंसान से न करे। परवरदिगार (ईश्वर) से तो बहुत दूर की बात है।

(3) ख़ानदान वालों के साथ कभी मुक़ाबला मत करना। नुक़सान क़बूल कर लेना, मगर मुक़ाबला मत करना। बाद में नतीजा ख़ुद मिल जाएगा।

(4) किसी भी जगह यह मत कहना कि "मैं आलिम हूँ, मेरे साथ रियायत (छूट/विशेष व्यवहार) करना।" यह एक नामाकूल (अनुचित) अमल है। कोशिश करो कि देने वाले बन जाओ।

(5) सबसे बेहतरीन दस्तरख़्वान घर का दस्तरख़्वान है। जो भी तुम्हारे नसीब में होगा, बादशाहों की तरह खा लोगे।

(6) अल्लाह के सिवा किसी से उम्मीद मत रखना।

(7) हर आने वाले दिन में अपनी मेहनत में मज़ीद (और) इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) करना।

(8) मालदारों और मुतकब्बिरों (घमंडियों) की मजलिसों (सभाओं) से दूरी इख़्तियार करना मुनासिब है।

(9) हर दिन सुबह के वक़्त सदक़ा करना, शाम के वक़्त इस्तिग़फ़ार (क्षमा प्रार्थना) का विर्द करना।

(10) अपनी गुफ़्तगू (बातचीत) में मिठास पैदा करना।

(11) ऊँची आवाज़ में छोटे बच्चे से भी बात मत करना।

(12) जिस जगह से तुम्हें रिज़्क़ (आजीविका) मिल रहा है, उस जगह की दिल व जान से इज़्ज़त करना। जिस क़दर अदब करोगे, इन्शाअल्लाह रिज़्क़ में इज़ाफ़ा होगा।

(13) कोशिश करो कि ज़िंदगी में कामयाब लोगों की सोहबत (संगति) में बैठा करो। एक न एक दिन ज़रूर तुम भी उस जमात (समूह) का हिस्सा बन जाओगे।

(14) हर फ़ील्ड (क्षेत्र) के हुनरमंद की इज़्ज़त करना, उनके साथ अदब से पेश आना चाहिए, ख़्वाह (चाहे) वह किसी भी फ़ील्ड का हो।

(15) वालिदैन (माता-पिता), असातिज़ा (शिक्षकों) और रिश्तेदारो के साथ जिस क़दर अख़्लाक़ (अच्छे व्यवहार) का मामला करोगे, उस क़दर तुम्हारे रिज़्क़ और ज़िंदगी में बरकत होगी।

(16) हर काम में मियाना-रवी (मर्यादा/संतुलन) इख़्तियार करना।

(17) आम लोगों के साथ भी तअल्लुक़ (संपर्क) रखना, इससे भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

(18) एक इंसान की शिकायत दूसरे से मत करना, हमारे प्यारे नबी करीम (ﷺ) शिकायत करने वाले को पसंद नहीं फ़रमाते थे।

(19) हर बात को मुस्बत (सकारात्मक) अंदाज़ में पेश करना, इससे बहुत से मसाइल (समस्याएं) हल हो जाएंगे।

(20) बड़ों की मजलिस में ज़बान ख़ामोश रखना।

आख़िर में दर्ज-ज़ैल (निम्नलिखित) दुआ सिखाई कि मुश्किल वक़्त में एहतेमाम (विशेष ध्यान) के साथ पढ़ा करो, इन्शाअल्लाह बहुत फ़ायदा होगा:

"رَبَّنَا آتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً وَّهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًا"

Share this article
मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब
लेख

मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब

हज़रात-ए-सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में कुछ मसलों पर मतभेद (इख़्तिलाफ़) रहा है; मगर एक-दूसरे के सम्मान (एहतराम) में कभी फ़र्क़ नहीं आया। कौन नहीं जानता कि ख़ून-ए-उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मसले पर सहाबा-ए-किराम में शदीद (गंभीर) मतभेद हुआ और इसकी वजह से जंग भी हुई; मगर क्या मजाल कि उनके इस...