*{इस्लाम से बगावत, कायनात (ब्रह्मांड) के शासक से बगावत है}*
यानी अल्लाह के नज़दीक इंसान के लिए सिर्फ एक ही जीवन-प्रणाली (निज़ाम-ए-ज़िंदगी) और एक ही जीवन-शैली सही और दुरुस्त है, और वह यह है कि इंसान अल्लाह को अपना मालिक और माबूद (पूज्य) स्वीकार करे और उसकी बंदगी व गुलामी में अपने आप को पूरी तरह सौंप दे, और उसकी इबादत का तरीका खुद ईजाद (आविष्कार) न करे; बल्कि उसने अपने पैगंबरों के माध्यम से जो हिदायत (मार्गदर्शन) भेजी है, बिना किसी कमी-बेशी (घटाने-बढ़ाने) के सिर्फ उसी का पालन करे। इसी सोच और अमल के तरीके का नाम "इस्लाम" है, और यह बात पूरी तरह सच है कि ब्रह्मांड का निर्माता और मालिक अपनी मख्लूक (सृष्टि) और प्रजा के लिए इस इस्लाम के अलावा किसी दूसरे तौर-तरीके को जायज़ स्वीकार न करे। आदमी अपनी मूर्खता (हमाक़त) से खुद को नास्तिकता (दहरियत) से लेकर शिर्क और मूर्तिपूजा तक हर विचारधारा और हर पंथ का पालन करने का हकदार समझ सकता है, मगर ब्रह्मांड के शासक (फरमांरवा-ए-कायनात) की नज़र में तो यह कोरी बगावत है।