मौलाना मबीयत उल्लाह साहब के बड़े साहबजादे हकीम महबूब उर रहमान फाजिल-ए-देवबंद का बयान है कि: "जब मैं देवबंद में पढ़ता था, तो हजरत अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी साहब के साथ उनके रिहायशी कमरे में मेरा कयाम था। हजरत को पान की आदत थी। एक दिन मैंने पान लगाकर पेश किया, तो उन्होंने मुंह में रखा ही था कि शेख-उल-हिंद सामने से तशरीफ लाते हुए नजर आए, जो किसी जरूरत से अपने शागिर्द के पास तशरीफ ला रहे थे। शाह साहब को हजरत के आने की इत्तला दी गई। मैं उस इज्तिराब को भूल नहीं सकता जो उस वक्त शाह साहब पर अपने उस्ताद की आमद और मुंह से पान निकालने की उजलत की सूरत में तारी था। तेजी के साथ अपने मुंह को साफ किया और कमरे के दरवाजे पर एक सरापा इनकसार खादिम की हैसियत से अपने आका के इस्तकबाल के लिए खड़े हो गए।"
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