मद्रास (चेन्नई) में एक अंग्रेज़ मुसलमान हुआ। मस्जिद में आकर उसने देखा कि नाली में बहुत सारा रेंठ वगैरह पड़ा है। उसने प्रबंधकों से कहा कि मस्जिद को साफ़ रखना ज़रूरी है, इसकी हालत इतनी ख़राब नहीं रखनी चाहिए।
यह सुनकर प्रबंधक कहने लगे कि तुझमें अभी ईसाइयत बाक़ी है, अभी सफ़ाई की गंध तेरे दिमाग़ से नहीं निकली। (गोया मुसलमान के लिए मैला-कुचैला और ख़राब व जर्जर हालत में रहना ज़रूरी है।) और वे इतने नाराज़ हुए कि उस नव-मुसलमान को मारकर मस्जिद से बाहर निकाल दिया।
कुछ समझदार लोगों को जब इस हरकत की ख़बर हुई, तो वे उस अंग्रेज़ नव-मुसलमान के पास आए और उसे तसल्ली देने लगे।
अंग्रेज़ नव-मुसलमान ने कहा: “क्या आपको यह अंदेशा है कि मैं इन लोगों की इस हरकत की वजह से इस्लाम छोड़ दूँगा?!.... मैं इन लोगों पर ईमान नहीं लाया, बल्कि मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाया हूँ और मैं जानता हूँ कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसे नहीं थे।”