ऐ बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) इतनी बेरुख़ी क्यों?

मुफ़्ती अ...
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21 September, 2026

ऐ बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) इतनी बेरुख़ी क्यों?

मुफ़्ती अब्दुल वहाब, लंदन

मोहब्बत सिर्फ़ अलफ़ाज़ का नाम नहीं, मोहब्बत वो है जो इंसान को बदल दे।

मक्का की तपती रेत, जलती धूप, सीने पर भारी पत्थर, जिस्म पर ज़ख़्म, मगर ज़बान पर एक ही सदा:

أَحَدٌ أَحَدٌ! (अहदुन अहद - अल्लाह एक है!)

ये हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु की तौहीद से वो वफ़ा थी जिसके लिए उन्होंने हर अज़िय्यत (तकलीफ़) बर्दाश्त कर ली। फिर इस्लाम ने उसी ग़ुलाम को वो मक़ाम दिया कि फ़तह-ए-मक्का के दिन रसूलुल्लाह ﷺ के हुक्म पर वो बैतुल्लाह की छत पर खड़े होकर अज़ान दे रहे थे। कल जिसे मक्का की गलियों में सताया जाता था, आज उसी की आवाज़ ख़ाना-ए-काबा से तौहीद का ऐलान कर रही थी।

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु की मोहब्बत रसूलुल्लाह ﷺ की हयात-ए-मुबारका तक सीमित नहीं थी। आप ﷺ के विसाल के बाद मदीना की गलियाँ उनके लिए बदल गईं। वो अज़ान, जो महबूब ﷺ के सामने दी जाती थी, अब दिल के ज़ख़्म ताज़ा कर देती थी। चुनाँचे वो मदीना से शाम (सीरिया) चले गए।

एक मशहूर रिवायत में आता है कि ख़्वाब में रसूलुल्लाह ﷺ की ज़ियारत हुई और फ़रमाया:

"يا بلال، ما هذه الجفوة؟ أما آن لك أن تزورني؟"

"ऐ बिलाल! ये बेरुख़ी क्यों? क्या अभी वक़्त नहीं आया कि तुम मेरी ज़ियारत करो?"

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना पहुँचे, रौज़ा-ए-रसूल ﷺ पर हाज़िर हुए और याद-ए-मुस्तफ़ा ﷺ में अश्कबार (ज़ार-ओ-क़तार रोने) हो गए।

सोचिए, वही मदीना, वही मस्जिद, वही मुअज्ज़िन, मगर रसूलुल्लाह ﷺ निगाहों के सामने न थे।

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़िंदगी हमें बताती है कि मोहब्बत सिर्फ़ जज़्बात नहीं, वफ़ा, क़ुर्बानी और इत्तिबा (पैरवी) का नाम है।

आज हम मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का दावा करते हैं, मगर अपने आप से पूछें:

क्या नमाज़ हमें महबूब ﷺ की याद दिलाती है?

क्या सुन्नत हमारी ज़िंदगी में नज़र आती है?

क्या हमारे इख़लाक़ में सीरत-ए-नबवी ﷺ की ख़ुशबू है?

क्या हम अपनी ख़वाहिश को आप ﷺ के तरीक़े पर क़ुर्बान कर सकते हैं?

मोहब्बत सिर्फ़ ज़बान से 'या रसूलुल्लाह' कहने का नाम नहीं। हक़ीक़ी मोहब्बत ये है कि ज़िंदगी के फ़ैसले भी रसूलुल्लाह ﷺ के तरीक़े के मुताबिक़ हों।

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु की सदा आज भी तारीख़ में गूँज रही है:

أَحَدٌ أَحَدٌ!

एक अल्लाह से वफ़ा, और रसूलुल्लाह ﷺ से बेमिसाल मोहब्बत। यही ईमान की हरारत (गर्मी), यही वफ़ा की ख़ुशबू, और यही इश्क़-ए-बिलाल है।

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