कहते हैं कि पहले ज़माने में शैतान आदमियों को नज़र आ जाता था।...
Ummah Post
16 July, 2026

कहते हैं कि पहले ज़माने में शैतान आदमियों को नज़र आ जाता था। एक साहब ने उससे कहा कि, "कोई तरकीब ऐसी बता कि मैं भी तुझ जैसा हो जाऊँ।" शैतान ने कहा कि, "ऐसी फरमाइश तो आज तक मुझसे किसी ने भी नहीं की, तुझे इसकी क्या ज़रूरत पेश आई?" उन्होंने कहा, "मेरा दिल चाहता है।" शैतान ने कहा, "इसकी तरकीब यह है कि नमाज़ में सुस्ती कर और कसम खाने में ज़रा भी परवाह न कर, झूठी-सच्ची हर तरह की कसमें खाया कर।" उन साहब ने कहा कि, "मैं अल्लाह से अहद (वादा) करता हूँ कि कभी नमाज़ न छोड़ूँगा और कभी कसम न खाऊँगा।" शैतान ने कहा कि, "तेरे सिवा मुझसे चाल के साथ (धोखे से) किसी ने कुछ नहीं लिया, मैंने भी अहद कर लिया कि आदमी को कभी नसीहत नहीं करूँगा।" (फ़ज़ाइल-ए-आमाल)

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मोहम्मद नाम के चार खुश-नसीब मुहद्दिसीन: इल्म-ए-हदीस की ख़िदमत का एक हैरतअंगेज़ वाक़या
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मोहम्मद नाम के चार खुश-नसीब मुहद्दिसीन: इल्म-ए-हदीस की ख़िदमत का एक हैरतअंगेज़ वाक़या

तीसरी सदी हिजरी में मिस्र में चार मुहद्दिसीन (हदीस के विद्वान) बहुत मशहूर हुए। चारों का नाम 'मोहम्मद' था, और चारों ही इल्म-ए-हदीस के जलील-उल-क़द्र (महान) अइम्मा (इमामों) में शुमार होते थे। उनमें से एक मोहम्मद बिन नस्र मर्वज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) हैं, दूसरे मोहम्मद बिन जरीर तबरी (रहमतुल्लाह अलैह), तीसर...