ज़रा कल्पना कीजिए! मस्जिद-ए-नबवी की वह नूरानी (प्रकाशमय) महफ़िल है, सहाबा इकराम (रज़ि.) शमा-ए-रिसालत ﷺ के इर्द-गिर्द परवानों की तरह जमा हैं। इसी बीच एक अराबी (देहाती) सेवा में उपस्थित होता है और वह सवाल कर देता है जो हर मोमिन के दिल की धड़कन है:
"या रसूलल्लाह! क़यामत कब आएगी?"
रहमत-ए-आलम ﷺ ने उसके सवाल का जवाब देने के बजाय उससे एक ऐसा सवाल किया जिसने क़यामत की फ़िक्र को अमल (कर्म) की फ़िक्र में बदल दिया:
"तुमने उस (क़यामत) के लिए क्या तैयारी कर रखी है?"
इश्क़-ए-सादिक़ (सच्चे प्रेम) का सादा मगर भारी जवाब
उस देहाती ने बड़ी आजिज़ी (विनम्रता) और सच्चाई से अर्ज़ किया:
"या रसूलल्लाह! मेरे पास बहुत ज़्यादा नमाज़ें, रोज़े और सदक़ात (दान) तो नहीं हैं (जिन पर मैं नाज़ कर सकूँ), लेकिन मैं अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से सच्ची मुहब्बत करता हूँ।"
यह वह वाक्य था जिसने अर्श वाले की रहमत को जोश में ला दिया और ज़बान-ए-नबुव्वत से वह अल्फ़ाज़ (शब्द) निकले जो दुनिया तक हर गुनाहगार उम्मती के लिए बख़्शिश (क्षमा) का प्रमाण बन गए:
"अल-मर'उ मअ मन अहब्ब"
"आदमी (क़यामत के दिन) उसी के साथ होगा जिससे वह मुहब्बत करता है।"
हज़रत अनस (रज़ि.), जिन्होंने दस साल हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत की, वह इस दृश्य की गवाही देते हुए फ़रमाते हैं:
"मैंने मुसलमानों को इस्लाम लाने के बाद किसी बात पर इतना ख़ुश होते नहीं देखा, जितना वे उस दिन हुज़ूर ﷺ की इस बात पर ख़ुश हुए"।
क्यों न ख़ुश होते? सहाबा इकराम (रज़ि.) को हर वक़्त यह ग़म खाए जाता था कि जन्नत में दर्जों की बुलंदी की वजह से कहीं हम अपने आक़ा ﷺ के दीदार से दूर न हो जाएँ। इस एक वाक्य ने उनकी तमाम फ़िक्रें दूर कर दीं कि अगर दिल में सच्ची मुहब्बत है, तो अल्लाह तुम्हें अपने हबीब ﷺ की रफ़ाक़त (साथ) से कभी महरूम (वंचित) नहीं करेगा।
हमें भी वह मइय्यत (साथ) नसीब हो जिसका वादा सादिक़ और अमीन ﷺ ने फ़रमाया है।