*हुज़ूर ﷺ का चेहरा-ए-अनवर (नूरानी चेहरा):*
हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) फ़रमाते हैं: हुज़ूर ﷺ के जो दंदान-ए-मुबारक (पवित्र दांत) थे, वो न ऐसे थे कि (ज़्यादा) फ़ासला हो और न ही ऐसे कि एक दूसरे के ऊपर चढ़े हुए हों। आप ﷺ के जितने दंदान-ए-मुबारक थे, अपनी-अपनी जगह ऐसे फ़िट थे जैसे मोती और नगीना फ़िट होता है। दरमियान (बीच) में मामूली-मामूली सा ख़ला (स्थान/अंतर) था।
सैयिदा आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फ़रमाती हैं: हुज़ूर ﷺ अगर गुफ़्तगू (बातचीत) के दरमियान किसी बात पर मुस्कुराते थे, तो आप ﷺ की मुस्कुराहट की वजह से उन दंदान-ए-मुबारक से ऐसी दल्फ़रेब (आकर्षक) रोशनी निकलती थी कि अगर उसका पर्तव (अक्स/परछाई) दीवार पर पड़ता था, तो अल्लाह तआला दीवार को भी रोशन फ़रमा देते थे। सुब्हान अल्लाह!
(शमाईल-ए-तिर्मिज़ी शरीफ़)