एक पीर साहब अपने मुरीदों (शिष्यों) के सामने अपनी करामत का ज़िक्र कर रहे थे... 🙂👇
"कि मैं सेहरा (रेगिस्तान) में जा रहा था, चलते-चलते दो दिन गुज़र गए थे। 🚶♂️ भूख लगती तो हाथ बढ़ाकर उड़ता हुआ कोई परिंदा पकड़ लेता और सूरज की रोशनी पर भूनकर खा लेता...!!
ख़ुदा का शुक्र अदा करके आगे चल पड़ता। नमाज़ का ख़्याल आया तो पानी ख़त्म हो चुका था, तो मैंने एक झाड़ी देखी; उसके पास जाकर ज़मीन से मुट्ठी भर रेत उठाई तो उसके नीचे से पानी का चश्मा (झरना) निकल आया। मैं पीने लगा तो ख़्याल आया कि यह झाड़ी प्यासी है, पहले इसे पानी पिलाऊँ। चुल्लू भर पानी उसकी जड़ में डाला तो वह पेड़ बन गई! और उसकी छाँव में नमाज़ अदा करने का सोचा। वज़ू के लिए चुल्लू में पानी लेकर कुल्ली की, तो जहाँ-जहाँ पानी गिरा, वहाँ गुलाब के फूल खिल गए...!!
चेहरे पर पानी डाला तो पानी के क़तरे ज़मीन पर गिरने के बजाय, हर क़तरा एक काले रंग का तोता बनकर पेड़ की टहनी पर बैठ गया और मेरे मुरीदों के लिए दुआ करने लगा... 😇💁♂️"
मुरीद जो झूम-झूम कर सुन रहे थे, उनमें से एक मुरीद बोला:
"पीर साहब, काले रंग का तोता...?? 😕🤔"
पीर साहब ने ग़ज़बनाक (ग़ुस्से) अंदाज़ में उसकी तरफ़ देखा, तो साथ बैठे दूसरे मुरीद ने कहा:
"चुप कर ओए...! यहाँ बाक़ी सारे काम बड़े साइंस के असूलों (नियमों) के मुताबिक़ हो रहे हैं, जो तुझे काले तोते पर शक है...!! 😁😂☠️"