"हम ईरान के मस्लक (पंथ) को स्वीकार नहीं करते, न ही उसकी नीतियों से सहमत हैं और न ही उसके जुल्म और ज्यादतियों को भूलते हैं। लेकिन अगर उस पर कोई बाहरी काफ़िर हमला करे, तो दीन (धर्म) का तक़ाज़ा हरगिज़ यह नहीं है कि हम काफ़िर के ग़लवे (जीत) पर खुशी मनाएं या उसकी मदद करें या यह तमन्ना करें कि मुसलमानों की कोई सरज़मीन उसके क़ब्ज़े में चली जाए।
इख़्तिलाफ़ (मतभेद) हो सकता है, मुख़ालफ़त (विरोध) हो सकती है, तंबीह (चेतावनी) भी की जा सकती है। मगर मुसलमानों की गर्दनें ऐसे दुश्मन के हवाले नहीं की जा सकतीं जो पूरी उम्मत पर घात लगाए बैठा है, और इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ईरान में एक ग़ैर-मामूली (बड़ी) तादाद अहल-ए-सुन्नत वल-जमाअत की भी मौजूद है, जो मज़हब और मस्लक में फ़र्क़ नहीं करता बल्कि इस्लाम को समग्र रूप से निशाना बनाता है।
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह शर (बुराई) को दूर करे, ख़ून-ख़राबे को रोके, हालात में सुधार फ़रमाए, और दुनिया भर में मज़लूम मुसलमानों की हिफ़ाज़त फ़रमाए।" (आमीन)
> फ़िलिस्तीनी दाई (प्रचारक), जिहाद हेलेस — ग़ज़ा
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