अजीब लोग थे वो तितलियां बनाते थे,
समंदरों के लिए सीपियां बन...
Ummah Post
25 February, 2026

अजीब लोग थे वो तितलियां बनाते थे,

समंदरों के लिए सीपियां बनाते थे।

वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला,

फिर उस के बाद वही चाबियां बनाते थे।

मेरे कबीले में तालीम (शिक्षा) का रिवाज न था,

मेरे बुज़ुर्ग मगर तख्तियां बनाते थे।

फ़ुज़ूल (खाली) वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर,

सुहागनों के लिए चूड़ियां बनाते थे।

हमारे गाँव में दो-चार हिंदू दर्जी थे,

नमाज़ियों के लिए टोपियां बनाते थे।

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हज़रत थानवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
लेख

हज़रत थानवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

मुदर्रिसीन (शिक्षकों) को चाहिए कि हर तालिब-ए-इल्म (छात्र) को पूरा अरबी पढ़ाना ज़रूरी न समझें, जिसके अंदर मुनासबत (योग्यता) देखें, और फ़हम-ए-सलीम (सही समझ) पाएँ, उसको सब किताबें पढ़ा दें, और जिसको मुनासबत न हो, या फ़हम-ए-सलीम न हो, उसको बक़द्रे-ज़रूरत (ज़रूरत के मुताबिक़) मसाइल पढ़ा कर कह दें कि जाओ...