इसलाही तअल्लुक़ (सुधार के रिश्ते) की अहमियत: हज़रत शाह हकीम...
Ummah Post
10 January, 2026

इसलाही तअल्लुक़ (सुधार के रिश्ते) की अहमियत: हज़रत शाह हकीम मोहम्मद अख्तर (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाने लगे कि जब तक किसी की इसलाह (सुधार) न हो, वह रूहानी (आध्यात्मिक) तौर पर नाबालीग़ (अपरिपक्व) होता है। जब नाबालीग़ हो तो भूल-चूक हो जाती है, कोताही (लापरवाही) हो जाती है। लेकिन जब इंसान नेक सोहबत (अच्छी संगति) इख़्तियार करता है और अपनी इसलाह की फ़िक्र होती है, तो फिर अल्लाह पाक आहिस्ता-आहिस्ता दिल को नेक जज़बात (अच्छे विचारों) से मुनव्वर (रोशन) कर देते हैं और ग़लत जज़बात को अल्लाह पाक मग़लूब (दबा/कम) कर देते हैं; वे ख़त्म तो नहीं होते, लेकिन मग़लूब हो जाते हैं।

Share this article
मोहम्मद नाम के चार खुश-नसीब मुहद्दिसीन: इल्म-ए-हदीस की ख़िदमत का एक हैरतअंगेज़ वाक़या
लेख

मोहम्मद नाम के चार खुश-नसीब मुहद्दिसीन: इल्म-ए-हदीस की ख़िदमत का एक हैरतअंगेज़ वाक़या

तीसरी सदी हिजरी में मिस्र में चार मुहद्दिसीन (हदीस के विद्वान) बहुत मशहूर हुए। चारों का नाम 'मोहम्मद' था, और चारों ही इल्म-ए-हदीस के जलील-उल-क़द्र (महान) अइम्मा (इमामों) में शुमार होते थे। उनमें से एक मोहम्मद बिन नस्र मर्वज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) हैं, दूसरे मोहम्मद बिन जरीर तबरी (रहमतुल्लाह अलैह), तीसर...