इसलाही तअल्लुक़ (सुधार के रिश्ते) की अहमियत: हज़रत शाह हकीम मोहम्मद अख्तर (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाने लगे कि जब तक किसी की इसलाह (सुधार) न हो, वह रूहानी (आध्यात्मिक) तौर पर नाबालीग़ (अपरिपक्व) होता है। जब नाबालीग़ हो तो भूल-चूक हो जाती है, कोताही (लापरवाही) हो जाती है। लेकिन जब इंसान नेक सोहबत (अच्छी संगति) इख़्तियार करता है और अपनी इसलाह की फ़िक्र होती है, तो फिर अल्लाह पाक आहिस्ता-आहिस्ता दिल को नेक जज़बात (अच्छे विचारों) से मुनव्वर (रोशन) कर देते हैं और ग़लत जज़बात को अल्लाह पाक मग़लूब (दबा/कम) कर देते हैं; वे ख़त्म तो नहीं होते, लेकिन मग़लूब हो जाते हैं।
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