*बेगम की ग्रामर (व्याकरण)*

इत्तेफ़ाक़ से मेरे हाथ से ग्ला...
Ummah Post
By Hassan
20 October, 2025

*बेगम की ग्रामर (व्याकरण)*

इत्तेफ़ाक़ से मेरे हाथ से ग्लास छूट गया और फ़र्श पर गिरकर टूट गया।

बेगम ने तीर की तरह इल्ज़ाम खींच मारा:

“आप हमेशा ग्लास तोड़ देते हैं!”

हालाँकि इससे पहले मुझसे फ़क़त (सर्फ़) एक ग्लास टूटा था, और वह भी हमारी शादी के शुरुआती दिनों में, यानी आज से कोई पंधरा साल पहले।

क्या पंधरा साल में कोई वाक़िया (घटना) दो दफ़ा पेश आए तो उसे “हमेशा” कहा जा सकता है?

लेकिन ज़नाना मंतिक़ (महिला लॉजिक) का अपना नाप-तौल होता है।

फिर यह “हमेशगी” का इल्ज़ाम मुझ पर सिर्फ़ ग्लास तोड़ने के सिलसिले में ही आयद (लागू) नहीं किया गया।

यही फ़र्द-ए-जुर्म (आरोप पत्र) मुझ पर कई दूसरी ख़ासी मासूमों हरकतों के ज़िक्र में भी लग चुका है।

“आप ग़ुस्लख़ाने (बाथरूम) का नलका हमेशा खुला छोड़ देते हैं!”

हालाँकि यह ग़लती पंधरा साल में शायद तीन या चार बार हुई होगी।

“आप हमेशा अलमारी की चाबी गुम कर देते हैं!”

यह जुर्म फ़क़त एक दफ़ा सरज़द (हुआ) हुआ था।

“आप हमेशा कार में पेट्रोल डलवाना भूल जाते हैं!”

यह हादसा एक दफ़ा भी नहीं हुआ था, महज़ पेट्रोल रुक जाने पर बेगम साहिबा को शुब्हा (शंका) हुआ कि पेट्रोल ख़त्म हो गया है।

लेकिन नहीं, मोहतरमा “हमेशा” का लफ़्ज़ महज़ आदतन इस्तेमाल नहीं करतीं।

ऐसा होता तो चंद ऐसे मौक़े भी हैं जहाँ यह लफ़्ज़ जायज़ तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है और करना चाहिए, मगर मजाल है जो बेगम साहिबा इसे नोक-ए-ज़बान पर लाएँ।

मसलन, हर महीने की पहली तारीख़ को पूरी तनख़्वाह बेगम के हवाले कर देता हूँ, लेकिन आज तक इस शरीफ़ज़ादी के मुँह से यह तारीफ़ न सुनी, यह न निकला कि “आप हमेशा तनख़्वाह लाकर मेरे हाथ पर रख देते हैं।”

बल्कि इस सिलसिले में कुछ फ़रमाती हैं तो यह कि:

"ख़ुदाया! कब महीना गुज़रे और चंद टकों का मुँह देखने को मिले!"

इसी तरह मेरा मअमूर (नियम) रहा कि बेगम को हर हफ़्ते एक नई फ़िल्म दिखाने सिनेमा ले जाता हूँ, मगर मजाल है जो इस “हमेशगी” का उन्हें ख़्याल तक आया हो।

बल्कि उल्टी शिकायत करती हैं:

“हाय! फ़िल्म देखे पूरा हफ़्ता होने को है!”

ख़ुदा जाने इस मौज़ू पर अपने मर्ग़ूब (पसंदीदा) लफ़्ज़ “हमेशा” को कैसे पी जाती हैं!

एक रोज़ ड्रॉइंग रूम में बैठा सिगरेट पी रहा था कि इत्तेफ़ाक़ से थोड़ी सी राख क़ालीन पर गिर गई। बेगम ने झट इल्ज़ाम तराशी की।

“आप हमेशा क़ालीन पर राख झाड़ देते हैं!”

मैंने कहा, “कभी-कभी राख गिर जाने से तो मुझे इंकार नहीं, लेकिन अगर मैं हमेशा अपने चालीस सिगरेट रोज़ाना की राख क़ालीन पर झाड़ता तो गुज़श्ता पंधरा साल में इस ड्रॉइंग रूम में तक़रीबन ग्यारह टन राख का ढेर लग चुका होता।

और इस सूरत में यह ड्रॉइंग रूम की बजाय कोयला सेंटर नज़र आता।”

लेकिन बजाय इसके कि अपनी ग़लती का एहसास करते हुए कोई माज़रत (खेद) करतीं या सीधी-सादी माफ़ी माँगतीं, कहने लगीं:

"तो सचमुच इतनी राख जमा हो जाती? फिर तो अच्छा हुआ, मैं ज्यों-त्यों करके हर रोज़ क़ालीन साफ़ करती रही!"

गोया मोहतरमा ने ग्यारह टन फ़र्ज़ी राख ढोने का क्रेडिट भी अपनी झोली में डाल लिया।

चंद रोज़ हुए दफ़्तर बंद हुआ तो मैं घर जाने की नीयत से कार में बैठा, मगर इंजन जवाब दे गया।

नाचार (मजबूरन) कार को दफ़्तर ही में छोड़ा और बस से घर रवाना हुआ। बस स्टॉप से घर पहुँचा, लेकिन जैसे ही अंदर क़दम रखा, बेगम चिल्लाईं।

“आप हमेशा कीचड़ से लथपथ जूते पहने ड्रॉइंग रूम में दाख़िल हो जाते हैं!”

यह मेरी पीठ पर आख़िरी तिनका था (बर्दाश्त की हद थी)।

मैंने उसी लम्हे एक फ़ैसला कर लिया, और इस फ़ैसले की रू से अब:

मैं हमेशा अपना सिगरेट क़ालीन पर झाड़ता हूँ, और बेगम साहिबा को सचमुच यह राख चुननी पड़ती है जिससे उन्हें दर्द-ए-कमर (कमर दर्द) की मुस्तक़िल (स्थायी) शिकायत है।

ग़ुस्लख़ाने का नलका हर रोज़ खुला छोड़ आता हूँ, और बेगम भागम-भाग बंद करती रहती हैं।

हर रोज़ आरज़ी (अस्थायी) तौर पर चाबियाँ गुम कर देता हूँ ताकि बेगम साहिबा थोड़ी देर के लिए स्टपटाएँ और स्टपटाती रहें।

जहाँ कहीं कीचड़ मिले, जूतों पर मल कर ड्रॉइंग रूम में आ जाता हूँ। बेगम पाँव पड़ती हैं कि “ख़ुदारा ऐसा न कीजिए!” मैं थोड़ी देर के लिए आँखें बंद करके लुत्फ़ उठाता हूँ।

अलग़रज़ (संक्षेप में) अब बेगम ने इन “हमेशा” वाले इल्ज़ामी जुमलों का इस्तेमाल तर्क (छोड़) कर दिया है।

अब उनका मर्ग़ूब फ़िक़्रा (पसंदीदा वाक्य) है:

“आप पहले तो ऐसा नहीं करते थे!”

वैसे मैं यह हरकतें करना छोड़ तो दूँगा, लेकिन अभी कुछ रोज़ नहीं, ताकि यह सबक़ बेगम साहिबा को अच्छी तरह ज़ेहन-नशीन (याद) हो जाए।

एक या दो को “हमेशा” कहना दुरुस्त नहीं, न हक़ीक़त के तौर पर और न ग्रामर की रू से।

आख़िरी ख़बर यह है कि बेगम साहिबा की ग्रामर बड़ी तेज़ी से सुधर रही है।

(मनक़ूल / साभार)

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