एक महान धार्मिक विद्वान, मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी — अकाबिर...
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By Arif
18 October, 2025

एक महान धार्मिक विद्वान, मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी — अकाबिर (बुजुर्गों) और अस्लाफ़ (पूर्वजों) का एक जीवित उदाहरण!

दारुल उलूम देवबंद में हज़रत हुसैन अहमद मदनी (रह.) के शागिर्द (शिष्य), सीनियर उस्ताद और सदरुल मुदर्रिसीन (मुख्य शिक्षक) जैसे योग्य और क़ाबिल हज़रात मौजूद थे, मगर अफ़गानिस्तान के विदेश मंत्री को हदीस शरीफ़ पढ़ाने और उनकी दस्तार-ए-फ़ज़ीलत (दीक्षांत समारोह) के मौक़े पर इमामत और क़िराअत का शरफ़ (सौभाग्य) हज़रत मौलाना मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी साहब (दामत बरकातुहुम) को नसीब हुआ। यह बात यक़ीनन क़ाबिल-ए-रश्क (ईर्ष्या के योग्य) और हैरतअंगेज़ है।

दारुल उलूम देवबंद के 160 साला इतिहास में वह एकमात्र ऐसी शख़्सियत हैं जिन्हें एक ही समय में मोहतमिम (कुलपति/नाज़िम-ए-आला) और शेख़ुल हदीस (हदीस के मुख्य प्रोफेसर) होने का गौरव प्राप्त है — और वह भी अत्यंत गरिमा और व्यापकता के साथ।

आज हम सिर्फ़ उनकी इस सफलता और सम्मान की बात सुनते और देखते हैं, मगर शायद यह नहीं जानते कि इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिए उन्होंने कितनी क़ुर्बानियाँ दी हैं, कितनी मेहनतें की हैं, और आज भी कर रहे हैं।

दारुल उलूम देवबंद आने से पहले हज़रत जहाँ अपनी शैक्षणिक सेवाएँ दे रहे थे, वहाँ सरकार की तरफ़ से वेतन और सुविधाओं का बेहतर इंतज़ाम था। मगर उन्होंने तक़रीबन एक लाख रुपये मासिक वेतन लेने से इनकार कर दिया और मामूली मानदेय पर ही ख़िदमत-ए-दीन (धर्म की सेवा) में व्यस्त रहे।

चूँकि उनका संबंध एक संयुक्त पारिवारिक प्रणाली से है, इसलिए उन्हें अपने पूज्य पिता के ज़माने से जारी ऐनक साज़ी (चश्मा बनाने) के कारोबार में भी कुछ समय देना पड़ता था। परिणामस्वरूप, उन्हें अपने इकलौते बेटे की शिक्षा लगभग पाँच साल के लिए स्थगित रखनी पड़ी। एक धर्मनिष्ठ, समझदार पिता के लिए यह क़ुर्बानी कितनी कठिन होगी, इसका अंदाज़ा हम शायद नहीं लगा सकते।

बाद में बेटे ने अपनी शिक्षा पूरी की। अल्हम्दुलिल्लाह, वह भी नेक, मुत्तक़ी (परहेजगार) और दूरदर्शी है, जैसा कि आजकल के बहुत कम साहबज़ादे (बेटे) होते हैं। शिक्षा समाप्त होने के बाद बेटे ने भी कारोबार संभाल लिया। इसी दौरान हज़रत दारul उलूम देवबंद के मोहतमिम नियुक्त हुए।

अब भी हज़रत के पिता का पुराना कारोबार क़ायम है, बेटे का भी बड़ा कारोबार है जो देश और विदेश में फैला हुआ है। मगर कोरोना के बाद से हज़रत ने बेटे का दिया हुआ कोई भी पैसा लेना बंद कर दिया। नाराज़गी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि अब उन्हें इसकी ज़रूरत महसूस नहीं होती। इसी तरह दारुल उलूम देवबंद से जो मामूली वज़ीफ़ा (भत्ता) मिलता था, वह भी शेख़ुल हदीस बनने के बाद लेना छोड़ दिया।

हम में से ज़्यादातर लोग यह समझते हैं कि अगर किसी मदरसे के मोहतमिम या शेख़ुल हदीस बन जाएँ तो बड़ी आमदनी हो जाएगी, मगर इन हज़रात को देखें; जितना उनका मुक़ाम बुलंद होता है, उतनी ही उनकी ज़ुहद-ओ-तक़्वा (वैराग्य और पवित्रता) और अल्लाह से निकटता बढ़ती जाती है। वे शुक्र और आजिज़ी (नम्रता) के साथ अल्लाह के हुज़ूर झुक जाते हैं। यही फ़र्क़ है उनमें और हममें! इसीलिए वे कामयाब हैं, और हम महरूम (वंचित)।

यह ज्ञान, कर्म, वैराग्य और पवित्रता वाली शख़्सियत के जीवन का सिर्फ़ एक पहलू है। हज़रत के जीवन में ऐसी अनगिनत क़ुर्बानियों और त्याग की कहानियाँ मौजूद हैं।

क़रीब के लोग जानते हैं कि हज़रत की एक बेटी गंभीर रूप से बीमार है — बचपन से ही। उसे पूरी देखरेख की ज़रूरत है। आज भी हज़रत, उनकी पत्नी और वही बेटी — यही उनका छोटा सा शांतिपूर्ण परिवार है। क़ज़ा-ओ-क़दर (भाग्य और विधाता के फैसले) पर राज़ी, संतोष और इत्मीनान से भरपूर।

हज़रत फ़रमाया करते हैं:

“तुम लोग जो कुछ मुझ में देखते हो, यह सब मेरी इसी बेटी की सेवा का फ़ैज़ (आशीर्वाद) है।”

और यही है हज़रत की सफलता और बरकत का असली राज़!

अल्लाह तआला हज़रत शेख़ (दामत बरकातुहुम) को सेहत और आफ़ियत के साथ लंबी और बरकत वाली उम्र अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बल आलमीन।

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