*हास्यप्रद*
एक हिंदी (भारतीय) अरब गए, वहां एक पार्क में बैठ...
Ummah Post
3 September, 2025

*हास्यप्रद*

एक हिंदी (भारतीय) अरब गए, वहां एक पार्क में बैठे थे, जिसके चारों तरफ आलीशान मकान थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि एक अरबी ने सिगरेट पी, फिर पी, और थोड़ी देर बाद फिर पी। हिंदी ने यह हाल देखकर उस अरबी से पूछा कि आप रोजाना कितने रुपये की सिगरेट पीते हैं? उसने बताया इतने रुपये की। हिंदी ने हिसाब लगाया कि एक दिन में इतने की; तो हफ्ते में इतने की; महीने में इतने की; साल में इतने की; एक बड़ी रकम बन गई। फिर अरबी से कहा कि अगर आप सिगरेट न पीते तो कितने रुपये बचते, जिससे यह मकान भी आपका होता, और वह मकान भी आपका होता। अरबी ने उससे पूछा कि क्या आप सिगरेट पीते हैं? हिंदी ने कहा, "नहीं।" अरबी ने कहा: "फिर तो यह मकान भी आपका होगा, और वह मकान भी आपका होगा?" फिर कहा कि यह मकान भी मेरा है, वह भी मेरा है, यह सब मकान, इतनी सिगरेट नोशी (धूम्रपान) के बावजूद मेरे हैं।

मलफूजात-ए-फकीह उल उम्मत, भाग चार, पृष्ठ ५०

*सबक*

किसी को किसी बात पर नसीहत (चेतावनी) देते हुए ऐसी बुद्धिमानी की बात बतानी चाहिए जिसे अक्ल स्वीकार भी करे। यहाँ चूंकि सिगरेट के पैसे बचाकर इतने बड़े-बड़े मकान बनाना अक्ल के खिलाफ था; इस वास्ते अरबी की अक्ल ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बजाय अगर यूं कहा जाता कि इतनी सिगरेट नोशी से आपकी सेहत का क्या हाल होगा, आज नहीं तो कल आपकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ने वाला है, तो यह बात अक्ल को लगती (समझ आती)। हो सकता है कि इससे अरबी सिगरेट नोशी से बाज (दूर) आ जाता।

स. ज़ेड. टपटोरी, १० रबी-उल-अव्वल १४४७ हिजरी

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लेख

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