अमीन अहसन इस्लाही रहिमहुल्लाह लिखते हैं:
"आदमी जब तक पत्नी (बीवी) से वंचित रहता है, वह कुछ खानाबदोश (बंजारे) सा बना रहता है और उसकी बहुत सी क्षमताएं (सलाहियतें) सिकुड़ी और दबी रहती हैं। इसी तरह महिला (औरत) जब तक पति (शौहर) से वंचित रहती है, उसकी स्थिति भी उस बेल (लत) की तरह होती है जो सहारा न मिलने के कारण फैलने, फूलने और फलने से महरूम (वंचित) रह जाए। लेकिन जब औरत को शौहर मिल जाता है और मर्द को बीवी का साथ हासिल हो जाता है, तो दोनों की क्षमताएं उभरती हैं और ज़िंदगी के मैदान में जब वे दोनों मिलकर संघर्ष (जद्दोजहद) करते हैं, तो अल्लाह तआला उनके संघर्ष में बरकत देता है और उनके हालात बिल्कुल बदल जाते हैं!"
[तदब्बुुर-ए-क़ुरआन 5/400]