"इस समय ख़तरे मोल लेकर काम करने की ज़रूरत है। अगर हम चाहें क...
Ummah Post
20 August, 2025

"इस समय ख़तरे मोल लेकर काम करने की ज़रूरत है। अगर हम चाहें कि कोई आंच न आए, ख़्वाब (सपने) में भी कोई ख़तरा पेश न आए, तो फिर किसी चीज़ पर हमारा कोई हक़ (इस्तहक़ाक़) नहीं है। हर ज़िंदा वजूद (प्राणी) को ख़तरा मोल लेना पड़ता है; चींटी जो बेहद मामूली (बे-हक़ीक़त) है, उसे भी ख़तरा मोल लेना पड़ता है, हालांकि वह जानती है कि वह मसल दी जाएगी, लेकिन जब वक्त पड़ता है तो उसे भी यही फ़ैसला करना पड़ता है। जो अपनी मदद खुद न कर सके, उसकी कोई मदद नहीं कर सकता।"

— मौलाना अबुल हसन अली नदवी (रहमतुल्लाह अलैह)

(हवाला: नई नस्ल के दीन व ईमान का तहफ़्फ़ुज़, पृष्ठ: 91)

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इमाम ज़ैनुल आबिदीन की गुप्त सेवा – इख़्लास (निःस्वार्थता) की एक बेमिसाल मिसाल
लेख

इमाम ज़ैनुल आबिदीन की गुप्त सेवा – इख़्लास (निःस्वार्थता) की एक बेमिसाल मिसाल

इमाम ज़ैनुल आबिदीन (रहमतुल्लाही अलैहि) को अल्लाह तआला ने बहुत ख़ूबसूरत जिस्म अता किया था। जब उनकी वफ़ात (मृत्यु) हुई और ग़स्साल (शव नहलाने वाला) उन्हें नहलाने लगा, तो उसने देखा कि उनके कंधे के ऊपर एक काला निशान है। उसे समझ नहीं आया कि यह काला निशान क्यों है? अहले-ख़ाना (परिवार वालों) से पूछा गया तो...