क़ुरआन देखते थे मोबाइल के हो गए,
उम्मत का सोचते थे मोबाइल क...
Ummah Post
4 October, 2024

क़ुरआन देखते थे मोबाइल के हो गए,

उम्मत का सोचते थे मोबाइल के हो गए।

दिल में नबी से प्यार की ख़ुशबू लिए हुए,

नेकी का बोलते थे मोबाइल के हो गए।

कितने हसीन दिन थे ग़म-ए-दीन को लेकर,

मस्जिद में बैठते थे मोबाइल के हो गए।

जिस सम्त (दिशा) निगाहों की ख़ताओं का ख़ौफ़ था,

चेहरे को फेरते थे मोबाइल के हो गए।

मअ्यूब (बुरा/नापसंद) हो इस्लाम की नज़रों में तो ऐसी,

ख़्वाहिश को रौंदते थे मोबाइल के हो गए।

इक पल भी मासिवाए ख़ुदा (ईश्वर के अलावा) पर फ़िदा न हो,

हम दिल को रोकते थे मोबाइल के हो गए।

- हुदहुद इलाहाबादी

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