इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह (१५० हिजरी) ने अपने शागिर्द (शिष्य) अबू यूसुफ़ रहमतुल्लाह (१८२ हिजरी) को वसीयत (नसीहत) करते हुए कहा:
"लोगों से बहुत ज़्यादा मेल-जोल मत रखो सिवाय इसके कि वे तुम्हारे साथ मेल-जोल रखना चाहें। और जब भी उनसे मिलो तो इल्म (ज्ञान) की बातें छेड़ दो। ताकि जो उनमें क़ाबिल हो वह इल्म के साथ मश्गूल (व्यस्त) हो जाए, और जो निकम्मा हो वह आपसे कतराना (बचना) शुरू कर दे, और आपसे लगाव ख़त्म कर दे, बल्कि आपके क़रीब भी न भटके।"
(मनाक़िब अबी हनीफ़ा लिल-मुवफ़्फ़क़ अल-मक्की: २/११४)