इंसाफ़ ज़ालिमों की हिमायत में जाएगा,
यह हाल है तो कौन अदालत में जाएगा।
दस्तार (पगड़ी/इज़्ज़त) नोच-नाच के अहबाब (दोस्त) ले उड़े,
सर बच गया है, यह भी शराफ़त में जाएगा।
दोज़ख़ (नरक) के इंतज़ाम में उलझा है रात-दिन,
दावा यह कर रहा है कि जन्नत में जाएगा।
ख़ुशफ़हमियों की भीड़ में तू भूल क्यों गया,
पहले मरेगा, बाद में जन्नत में जाएगा।
वाक़िफ़ है ख़ूब झूठ के फ़न (कला) से यह आदमी,
यह आदमी ज़रूर सियासत (राजनीति) में जाएगा।
— डॉक्टर राहत इंदौरी