समझदार वह है जो हर छोटी बात का बतंगड़ (बड़ा) न बनाए। घर वालों, दोस्तों और पड़ोसियों की हर बात पर पकड़ न करे।
कभी-कभी खामोशी सबसे बेहतर जवाब होती है।
हर बात का हिसाब न लगाए, हर शब्द का मतलब न निकाले।
इंसान गलतियों का पुतला है, दरगुज़र (माफ़ करना) अपनाएं।
पत्नी के हर ख़र्च का इस तरह हिसाब न लो जैसे वह कोई कर्मचारी (मुलाज़िम) हो...
और पति के हर ख़र्च पर इस तरह शक न करो...
रह्म (दया), नरमी और सहनशीलता का दामन न छोड़ो।
यकीन मानिए कि हर चीज़ में छानबीन (बाल की खाल निकालने) करने वाला सुकून (शांति) से महरूम हो जाता है।
— इब्न अल-जौज़ी (रहमतुल्लाह अलैह)
[उद्धरण: तहज़ीब अल-कमल लिल-मिज़्ज़ी]