*गैर-मुस्तहिक़ (अपात्र) का जकात लेने का इबरतनाक (चेतावनीपूर्ण) वाक़या*
*मुफ्ती-ए-आज़म मुफ्ती मोहम्मद रफ़ी उस्मानी (मद्ज़िल्लहु) फरमाते हैं:*
हिंदुस्तान में हमारे एक रिश्तेदार थे। उनकी औलाद, फिर उनकी औलाद की औलाद को हमने देखा; उनमें से कोई भी मर्द, औरत या बच्चा ऐसा नहीं है जो किसी न किसी खतरनाक मुसीबत में मुब्तला (ग्रस्त) न हो... एक मुसीबत खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है...
वालिद मोहतरम मुफ्ती मोहम्मद शफ़ी साहब (रहमतुल्लाह अलैह) एक मर्तबा मुझसे फरमाने लगे कि "इस खानदान में जो मुसीबतें इतनी कसरत (अधिकता) से नज़र आती हैं... मुझे उसकी सिर्फ एक ही वजह मालूम होती है कि वो फलां साहब जो उनके दादा थे, वह जकात के हकदार (मस्तहिक) तो नहीं थे, लेकिन जकात ले लिया करते थे।"
— [इसलाही मजलिसें, जिल्द 1, पृष्ठ 116]