हया (शर्म व हया) हमेशा खैर (भलाई) ही लाती है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:
"ईमान की सत्तर से ज़्यादा शाखाएँ (इक्शाम) हैं। और हया भी ईमान का एक हिस्सा है।"
— सहीह अल-बुख़ारी
हया (शर्म व हया) हमेशा खैर (भलाई) ही लाती है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:
"ईमान की सत्तर से ज़्यादा शाखाएँ (इक्शाम) हैं। और हया भी ईमान का एक हिस्सा है।"
— सहीह अल-बुख़ारी