*(शादी से पहले)*

तुम जो हंसती हो तो फूलों की अदा लगती हो,...
Ummah Post
9 June, 2025

*(शादी से पहले)*

तुम जो हंसती हो तो फूलों की अदा लगती हो,

और चलती हो तो इक बाद-ए-सबा (सुबह की हवा) लगती हो।

दोनों हाथों में छुपा लेती हो अपना चेहरा,

मशरिक़ी (पूर्वी) हूर हो, दुल्हन की हया लगती हो।

कुछ न कहना मेरे कंधे पे झुका कर सर को,

कितनी मासूम हो, तस्वीर-ए-वफ़ा लगती हो।

बात करती हो तो साग़र (जाम) से खनक जाते हैं,

लहर का गीत हो, कोयल की सदा (आवाज़) लगती हो।

किस तरफ़ जाओगी जुल्फ़ों के ये बादल ले कर,

आज मचली हुई सावन की घटा लगती हो।

तुम जिसे देख लो, उसे पीने की ज़रूरत क्या है...?

ज़िंदगी भर जो रहे, ऐसा नशा लगती हो।

मैंने महसूस किया तुम से ये बातें कर के,

तुम ज़माने में ज़माने से जुदा लगती हो...!

💠💠💠💠💠💠

*(शादी के बाद)*

तुम जो हंसती हो तो आसिब-ज़दा (भूत-प्रेत से ग्रस्त) लगती हो,

और रोती हो तो उस से भी बुरा लगती हो।

दोनों हाथों में छुपा लेती हो बटुआ मेरा,

तुम निरी (बिलकुल) चोर हो, चोरों की सभा लगती हो।

कुछ न कहना मिरे कांधे पे झुका कर सर को,

बात करते हुए एक भोंपू फटा लगती हो।

किस तरफ़ जाओगी यह ज़हर भरा फन ले कर,

आज मचली हुई नागिन की अदा लगती हो।

साथ गर तुम हो तो दुश्मन की ज़रूरत क्या है,

बल्कि ईज़ा (तकलीफ़) में तो दुश्मन से सिवा (ज़्यादा) लगती हो।

मैंने महसूस किया साथ तुम्हारे रह के,

पड़ गई सर मिरे तुम ऐसी बला लगती हो।

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