"जब इंसान अपनी ज़िद, ग़ुरूर (अहंकार) और अना (अहम) के खोल में बंद हो जाता है, तो फिर सच्चाई की रोशनी भी उसके दिल तक नहीं पहुँचती। इल्म (ज्ञान) तब ही असर करता है जब दिल झुकने को तैयार हो, और सीखने वाला खुद को खाली महसूस करे। लेकिन जब कोई सिर्फ अपनी बरतरी (श्रेष्ठता) साबित करने पर तुल जाए, तो वह सच को नहीं, सिर्फ अपनी अना (अहंकार) को जिताता है और इस तरह इल्म, अक़्ल और फ़हम (समझ) सब हार जाते हैं।"
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