"एक दिन मैं उपदेश (वाइज़) के मंच पर बैठा था, मेरे चारों ओर द...
Ummah Post
6 May, 2025

"एक दिन मैं उपदेश (वाइज़) के मंच पर बैठा था, मेरे चारों ओर दस हज़ार लोगों की भीड़ थी, सबके दिल नर्म थे और आँखें बह रही थीं। मैंने अपने दिल में कहा: 'क्या गुज़रेगी अगर ये सब निजात (मुक्ति) पा जाएं और तू हलाक (बर्बाद) हो जाए?!' फिर मैंने दिल ही दिल में पुकारा: 'मौला! आक़ा! कल अगर तू मुझे अज़ाब (दंड) देने का फ़ैसला करे, तो इन लोगों को इसकी ख़बर न होने देना; मेरा नहीं तो अपने करम का ही भ्रम (लाज) रख लेना! कहीं ये लोग यह न सोचें कि अल्लाह ने उस बंदे को अज़ाब दिया है जिसने हमें उसकी राह दिखाई थी!'"

(सैय्यद अल-वाइज़ीन: इब्न अल-जौज़ी, रहमतुल्लाही अलैहि, मृ. 597 हिजरी)

Share this article
इल्म-ए-नाफ़े (लाभकारी ज्ञान) की निशानियां
लेख

इल्म-ए-नाफ़े (लाभकारी ज्ञान) की निशानियां

एक सवाल ज़हन में पैदा होता है कि इल्म-ए-नाफ़े (फ़ायदा पहुँचाने वाले ज्ञान) की अलामत (निशानी) क्या होती है? जी हाँ, नफ़ा (लाभ) देने वाला इल्म भी होता है। नबी अलैहिस्सलाम ने हमें दुआ सिखाई है: "ऐ अल्लाह! मैं पनाह माँगता हूँ ऐसे इल्म से जो नफ़ा न देता हो।" चुनाँचे इल्म-ए-नाफ़े की दो अलामतें (निशानियाँ)...