ذَرْهُمْ یَاْكُلُوْا وَ یَتَمَتَّعُوْا وَ یُلْهِهِمُ الْاَمَلُ فَسَوْفَ یَعْلَمُوْنَ(۳)(سورۃ الحجر)
अनुवाद
(ऐ पैगंबर) उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो कि ये ख़ूब खा लें, मज़े उड़ा लें, और ख़याली उम्मीदें उन्हें ग़फ़लत में डाले रखें¹, क्योंकि अनक़रीब (जल्द ही) उन्हें पता चल जाएगा (कि हक़ीक़त क्या थी)।
1: इस आयत में क़ुरआन करीम ने तवज्जो दिलाई है कि सिर्फ खाने-पीने और दुनिया में मज़े उड़ाने को अपनी ज़िंदगी का असल मक़सद बना लेना और इसी के लिए इस तरह लंबी-लंबी ख़याली उम्मीदें बांधते रहना जैसे ज़िंदगी बस यही है—यह काफ़िरों का काम है। मुसलमान दुनिया में रहता ज़रूर है और इसमें अल्लाह तआला की दी हुई नेमतों से फ़ायदा भी उठाता है, मगर इस दुनिया को अपनी ज़िंदगी का मक़सद नहीं बनाता। बल्कि इसे आख़िरत की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है जिसका बेहतरीन रास्ता शरीअत के अहकाम की पाबंदी है। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)