اِنَّ اللّٰهَ لَا یَغْفِرُ اَنْ یُّشْرَكَ بِهٖ وَ یَغْفِرُ مَا دُوْنَ ذٰلِكَ لِمَنْ یَّشَآءُ وَ مَنْ یُّشْرِكْ بِاللّٰهِ فَقَدِ افْتَرٰۤى اِثْمًا عَظِیْمًا(۴۸)(سورۃ النساء)
अनुवाद
बेशक अल्लाह इस बात को माफ़ नहीं करता कि उसके साथ किसी को शरीक ठहराया जाए, और इससे कमतर हर बात को जिसके लिए चाहता है माफ़ कर देता है।¹ और जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराता है वह ऐसा बोहतान बांधता है जो बड़ा ज़बरदस्त गुनाह है।
(1) यानी शिर्क से कम किसी गुनाह को अल्लाह तआला जब चाहे तौबा के बग़ैर भी महज़ अपने फ़ज़्ल से माफ़ कर सकता है; लेकिन शिर्क की माफ़ी इसके बग़ैर मुमकिन नहीं कि मुशरिक अपने शिर्क से सच्ची तौबा करके मौत से पहले-पहले इस्लाम क़ुबूल करके तौहीद पर ईमान ले आए। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)