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फीस विवाद: दिल्ली के निजी स्कूलों की मनमानी और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त कार्रवाई

याचिका का आधार:

नई समाज पेरेंट्स एसोसिएशन की ओर से दायर एक याचिका ने दिल्ली के निजी स्कूलों की मनमानी को सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के सामने ला खड़ा किया है। याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार ने कई निजी स्कूलों को रियायती दरों पर जमीन इस शर्त के साथ दी थी कि फीस में किसी भी बढ़ोतरी के लिए शिक्षा निदेशालय (डायरेक्टोरेट ऑफ एजुकेशन) की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी। लेकिन स्कूलों ने इस शर्त का उल्लंघन करते हुए फीस में 100 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जब याचिकाकर्ता की दलीलें सुनीं, तो स्कूल के वकील से सख्त लहजे में सवाल किया:

"आप इस शर्त को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं?"

अदालत ने दिल्ली सरकार और अनएडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स की एक्शन कमेटी को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है।

छात्रों के साथ दुर्व्यवहार:

याचिका में यह भी खुलासा किया गया है कि डीपीएस (DPS) द्वारका ने बढ़ी हुई फीस न देने पर करीब 30 छात्रों को सजा दी और उन्हें कक्षाओं में बैठने से रोक दिया। इन छात्रों को लाइब्रेरी में बैठने के लिए मजबूर किया गया, जो न केवल शिक्षा के अधिकार का अपमान है बल्कि बच्चों के भावनात्मक सम्मान पर भी हमला है।

इस पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने नाराजगी जताते हुए कहा:

"आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? ये छात्र हैं, कोई अपराधी नहीं! इन्हें तुरंत कक्षाओं में वापस लाया जाए।"

अदालत के इस निर्देश ने छात्रों के पक्ष में एक मजबूत संदेश दिया कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, जिसे वित्तीय विवादों की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।

हाई कोर्ट का पुराना रुख:

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने भी डीपीएस द्वारका के रवैये की कड़ी आलोचना की थी। खबरों के मुताबिक, स्कूल ने फीस विवाद को लेकर कुछ छात्रों को प्रवेश से रोकने के लिए कथित तौर पर "बाउंसर्स" की सेवाएं ली थीं। हाई कोर्ट ने इसे अस्वीकार्य करार दिया था, और अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे और आगे बढ़ाया है।

स्कूल का वादा और अगली सुनवाई:

डीपीएस द्वारका का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि ऐसी स्थिति दोबारा पैदा नहीं होगी। अदालत ने इस वादे को दर्ज करते हुए मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है। यह अवधि दिल्ली सरकार और स्कूलों को अपना रुख स्पष्ट करने का मौका देगी।

सर्वोच्च न्यायालय का संदेश:

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है, बल्कि दिल्ली सरकार के लिए भी एक याद दिलाता है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से ले। यह मामला महज फीस बढ़ोतरी का नहीं है, बल्कि शिक्षा की पवित्रता, छात्रों के अधिकारों और कानून के शासन का है। जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने अपनी फटकार में स्पष्ट किया, शैक्षणिक संस्थानों को अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

संदर्भ:

द हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडिया टुडे, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, एक्स पोस्ट