मुंबई: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) बी.आर. गवई पर हुए अप्रिय हमले के खिलाफ ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन (AILU) और मुंबई की अंधेरी अदालत के वकीलों ने गुरुवार, 9 अक्टूबर को सीजेएम कोर्ट कॉम्प्लेक्स में पुरजोर विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए एक बुलंद आवाज बनकर उभरा।
इस विरोध प्रदर्शन में 30 से अधिक वकीलों ने भाग लिया, जिन्होंने अपने जोरदार भाषणों में इस शर्मनाक घटना की कड़ी निंदा की। उन्होंने न्यायपालिका की पवित्रता को बनाए रखने और इसे हर प्रकार के वैचारिक हमलों से सुरक्षित रखने के लिए एकता की अपील की। AILU ने इस घटना को 'न्यायपालिका पर एक सुनियोजित हमला' करार देते हुए कहा कि यह केवल किसी व्यक्ति का अस्थायी पागलपन नहीं है, बल्कि आरएसएस से प्रभावित दक्षिणपंथी तत्वों द्वारा संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है।
6 अक्टूबर की शर्मनाक घटना:
6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के कमरा नंबर एक में संवैधानिक पीठ की सुनवाई शुरू होते ही, 71 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंका और बुलंद आवाज में नारे लगाए कि 'हिंदुस्तान सनातन का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।' सौभाग्य से जूता अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका। मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपनी शानदार सहनशीलता का परिचय देते हुए कहा, 'मैं ऐसी हरकतों से प्रभावित नहीं होता, कृपया कार्यवाही जारी रखें।' उनके इस धैर्य और संयम ने न्यायिक गरिमा को और ऊंचा किया, और कार्यवाही सामान्य रूप से जारी रही।
सुरक्षाकर्मियों ने राकेश किशोर को तुरंत हिरासत में ले लिया, लेकिन मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर उनके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई से परहेज किया गया। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने व्यावसायिक नैतिकता के गंभीर उल्लंघन के कारण उनका वकालत का लाइसेंस निलंबित कर दिया।
दलित मुख्य न्यायाधीश पर पूर्वाग्रह का आरोप:
AILU ने स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश गवई को उनकी दलित पृष्ठभूमि के कारण निशाना बनाया जा रहा है। संगठन के अनुसार, हालिया सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश द्वारा कानूनी संदर्भ में हिंदू देवता विष्णु के उल्लेख को 'हिंदुत्व ताकतों' द्वारा गलत रंग देकर 'सनातन धर्म के अपमान' के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह कार्य न केवल मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ व्यक्तिगत हमला है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर भी एक गंभीर प्रहार है। संगठन ने इसे 'नाथूराम गोडसे वाली मानसिकता' करार दिया, जो एक बार फिर न्यायपालिका और संविधान के बुनियादी ढांचे को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
AILU की मांगें और संकल्प:
AILU ने इस शर्मनाक घटना की तत्काल, निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की है, ताकि न केवल इसमें शामिल व्यक्ति बल्कि उसके पीछे काम करने वाली किसी भी साजिशी ताकत को अंजाम तक पहुंचाया जा सके। संगठन ने देश भर के वकीलों और नागरिक समाज से अपील की है कि वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन करें, रैलियां निकालें और प्रणालीगत सुधारों की मांग करें।
महाराष्ट्र में जल्द ही शांतिपूर्ण रैलियां और ऑनलाइन अभियान शुरू किए जाएंगे। इसके अलावा, AILU सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायिक संस्थानों में याचिकाएं दायर करेगा, जिसमें ऐसी हरकतों के खिलाफ सख्त सजा और न्यायिक सुरक्षा के लिए सुधारों की मांग की जाएगी।
न्यायपालिका की पवित्रता और हमारा संकल्प:
यह घटना महज किसी व्यक्ति या संस्था पर हमला नहीं है, बल्कि भारत के संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर हमला है। मुंबई की अदालतों से बुलंद हुई वकीलों की यह आवाज एक बड़ा संदेश है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा को हर कीमत पर बरकरार रखा जाएगा। यह विरोध प्रदर्शन न केवल मुख्य न्यायाधीश गवई के साथ एकजुटता की अभिव्यक्ति है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक संकल्प है जो न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता है।
संदर्भ:
द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इंडियन एक्सप्रेस, एक्स पोस्ट