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सुप्रीम कोर्ट ने असम भाजपा के एक एआई वीडियो पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मुसलमानों को बदनाम किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने असम भाजपा इकाई द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक कृत्रिम वीडियो पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मुसलमानों को बदनाम किया गया है और दावा किया गया है कि भाजपा के हारने पर 'मुसलमान असम पर कब्जा कर लेंगे'। यह वीडियो 15 सितंबर, 2025 को भाजपा असम के आधिकारिक X हैंडल पर पोस्ट किया गया था, जिससे आम जनता और कानूनी हलकों में काफी आक्रोश फैल गया। कोर्ट ने सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर, 2025 की तारीख तय की है। वीडियो और विवाद: वीडियो में कृत्रिम रूप से निर्मित दृश्य दिखाए गए हैं, जिनमें भाजपा के हारने पर मुसलमानों को 'दुश्मन' के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और टोपी और दाढ़ी वाले लोगों को उन पर 'कब्जा' करते हुए दिखाया गया है। याचिकाकर्ता कुर्बान अली के वकील निज़ाम पाशा ने कोर्ट को बताया कि वीडियो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3ए) और 125 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक आधार पर शत्रुता फैलाने और अपील करने पर रोक लगाती हैं। पाशा ने कहा, "यदि कोई निर्वाचित सरकार धर्म या जाति के आधार पर घृणा फैलाने वाले वीडियो को बढ़ावा देती है, तो यह संविधान की भावना के विरुद्ध है।" सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता शामिल थे, ने भाजपा असम, चुनाव आयोग और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई की थी। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा, “यह वीडियो सांप्रदायिक नफरत फैला रहा है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।” याचिका में आगे कहा गया कि वीडियो के व्यापक प्रसार से असम में तनाव बढ़ गया है और चुनाव आयोग इस पर चुप्पी साधे हुए है। राजनीतिक प्रतिक्रिया: कांग्रेस नेता पोनमोय मैत्री ने वीडियो को “नफरत फैलाने वाली फिल्म” बताया, जबकि असम कांग्रेस ने भाजपा पर “सांप्रदायिक राजनीति” का आरोप लगाया। भाजपा असम के अध्यक्ष हर्ष देव ने वीडियो का खंडन करते हुए कहा कि “यह फर्जी है और भाजपा का हिस्सा नहीं है।” हालांकि, X पर वीडियो के वायरल होने से जनता का गुस्सा बढ़ गया, जहां उपयोगकर्ताओं ने इसे “इस्लामोफोबिया का एक नया उदाहरण” बताया। इस घटना ने असम में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है, जहां भाजपा की “हिंदू-मुस्लिम” राजनीति की आलोचना बढ़ रही है। “नफरत फैलाने वाले वीडियो को बढ़ावा देना लोकतंत्र पर हमला है। अदालत का फैसला स्वागत योग्य है।” — निजाम पाशा। संदर्भ: लाइव लॉ, द वायर, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, X पोस्ट