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ईडी ने अनिल अंबानी से सवाल किया: 17,000 करोड़ रुपये का घोटाला या सरकारी तमाशा?

ईडी ने अनिल अंबानी से पूछताछ की: 17,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में बवाल, लेकिन क्या यह सब सिर्फ एक नाटक है? भारतीय शेयर बाजार को हिला देने वाली एक और खबर ने पूंजीपतियों और जनता के बीच चल रहे खेल को उजागर कर दिया है। रिलायंस समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी कथित 17,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सामने पेश हुए। ये वही अंबानी हैं जिनका व्यापारिक नेटवर्क कभी आसमान छूता था, लेकिन आज वे कर्ज के जाल में फंसने के कारण जांच के दायरे में हैं। ईडी ने 24 जुलाई से शुरू हुए तीन दिवसीय छापों में 35 स्थानों से 50 कंपनियों और 25 व्यक्तियों से संबंधित दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए। जांच यस बैंक से 2017-19 के दौरान 3,000 करोड़ रुपये के अवैध ऋण हस्तांतरण और रिलायंस कम्युनिकेशंस द्वारा 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी के मामले में जारी है। लेकिन एक कड़वी सच्चाई भी है। जहां ईडी के छापे और पूछताछ सुर्खियों में हैं, वहीं जनता यह सवाल उठा रही है कि क्या यह सब सिर्फ दिखावा है। अनिल अंबानी और अदानी जैसे बड़े पूंजीपतियों के खिलाफ जांच चल रही है, लेकिन अक्सर नतीजे शून्य होते हैं। यस बैंक के प्रमोटर कर्ज़ से पहले रिश्वतखोरी, फर्जी कंपनियों के ज़रिए धन शोधन और जाली दस्तावेज़ों का खेल—ये सब एक संगठित साजिश की ओर इशारा करते हैं। लेकिन सरकार का रवैया क्या कहता है? जब आम आदमी छोटा सा कर्ज़ न चुका पाने पर जेल पहुँच जाता है, तो इन पूंजीपतियों को बार-बार राहत क्यों मिल जाती है? क्या यह कानून का शासन है या पूंजीपतियों का? सरकार की चुप्पी और ईडी की चुनिंदा कार्रवाइयाँ जनता के घावों पर नमक छिड़कती हैं। जब रिलायंस पावर और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के शेयर गिरते हैं, तो नुकसान किसका होता है? आम निवेशक का, जो अपनी मेहनत की कमाई इन कंपनियों में निवेश करता है। दूसरी ओर, चाहे अडानी समूह के खिलाफ आरोपों की बौछार हो या अंबानी की जांच, सरकार का संरक्षण इन्हीं के साथ है। बंदरगाहों, हवाई अड्डों और ऊर्जा परियोजनाओं से लेकर सरकारी ठेकों तक, इन पूंजीपतियों की जड़ें गहरी हैं। जहाँ आम भारतीय महंगाई, बेरोजगारी और करों के बोझ तले दबे हैं, वहीं ये पूंजीपति सरकार की छत्रछाया में फल-फूल रहे हैं। ईडी ने 68.2 करोड़ रुपये की फर्जी बैंक गारंटी के आरोप में बिस्वाल ट्रेडलिंक के प्रबंध निदेशक पार्थ सारथी बिस्वाल को गिरफ्तार किया। लेकिन क्या? क्या इस गिरफ्तारी से असली दोषियों तक पहुंचा जा सकेगा, या यह सिर्फ एक मोहरा मात्र है? जनता को सरकार की प्राथमिकताएं साफ नजर आ रही हैं। जहां किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर रहे हैं, वहीं कानून इन पूंजीपतियों के लिए एक नरम कवच बन गया है। सरकार से यह सवाल पूछने का समय आ गया है: क्या कानून सबके लिए समान है? या यह सिर्फ गरीबों को दबाने का एक हथियार है? जब तक अंबानी और अडानी जैसे लोग सरकार का संरक्षण पाते रहेंगे, जनता की आवाज दबती रहेगी। अगर यह जांच वाकई न्याय की ओर ले जाती है, तो यह एक क्रांति होगी। अन्यथा, यह सिर्फ एक तमाशा है, जिसका बोझ आम भारतीय पर पड़ेगा। संदर्भ: इंडिया टुडे, 4 अगस्त 2025; इंडियन एक्सप्रेस, 25 जुलाई 2025; एनडीटीवी, 5 अगस्त 2025; एक्स-पोस्ट्स, अगस्त 2025