विवाद की शुरुआत: गुरुवार, 26 जून, 2025 को दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान, आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने संविधान की प्रस्तावना से “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्दों को हटाने की बात कही। उन्होंने कहा कि ये शब्द 1976 के आपातकाल के दौरान जबरदस्ती जोड़े गए थे और संविधान में इनका कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा, “ये शब्द आपातकाल के अंधकारमय दौर में संविधान पर थोपे गए थे। अब समय आ गया है कि इन्हें हटा दिया जाए ताकि संविधान अपने मूल स्वरूप के अनुरूप हो सके।” इस बयान ने राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मचा दी। विपक्षी दलों ने इसे संविधान पर हमला बताया, जबकि राहुल गांधी ने इसे आरएसएस और भाजपा के गुप्त एजेंडे का सबूत बताया। राहुल गांधी का कड़ा जवाब: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने X पर एक पोस्ट के जरिए आरएसएस और भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा, “आरएसएस का मुखौटा एक बार फिर उतर गया है। संविधान उन्हें इसलिए चुभता है क्योंकि उसमें समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय की बात की गई है। आरएसएस और भाजपा को संविधान नहीं, मनुस्मृति की जरूरत है। वे बहुजनों और गरीबों के अधिकार छीन रहे हैं और उन्हें वे उन्हें फिर से गुलाम बनाना चाहते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य संविधान जैसे शक्तिशाली हथियार को छीनना है। आरएसएस को यह सपना देखना बंद कर देना चाहिए। हम उन्हें कभी सफल नहीं होने देंगे। हर देशभक्त भारतीय अपनी आखिरी सांस तक संविधान की रक्षा करेगा।” राहुल गांधी के इस बयान ने न केवल राजनीतिक गलियारों में बल्कि सोशल मीडिया पर भी एक बड़ी बहस छेड़ दी। X पर एक यूजर ने लिखा: “संविधान हमारा गौरव है, और कोई भी इसकी आत्मा को छीन नहीं सकता। राहुल गांधी ने आज हर भारतीय के दिल की बात कही।” चंद्रशेखर आजाद का रुख: आजाद राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संविधान हर नागरिक के लिए एक सुरक्षा कवच है। उन्होंने कहा: “संविधान की आत्मा कभी किसी दल या विचारधारा की कैदी नहीं रही है। 1976 में संशोधन जरूर किए गए थे, लेकिन बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि अगर इरादा शुद्ध है, तो यह संविधान दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित होगा। आरएसएस के बयान इस संविधान की आत्मा पर हमला हैं, जिसे हम कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे।” चंद्रशेखर ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है, और इसे किसी भी वैचारिक एजेंडे से क्षतिग्रस्त नहीं होने दिया जाएगा। राजनीतिक उथल-पुथल और जन प्रतिक्रिया: होसबले के बयान ने भारतीय राजनीति में एक नई रेखा खींच दी है। विपक्षी दलों ने इसे भाजपा और आरएसएस के "हिंदुत्व एजेंडे" का हिस्सा बताया है, जबकि भाजपा ने इसे महज एक "बौद्धिक बहस" करार दिया है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिपाठी ने कहा कि होसबले का बयान उनका निजी मत था और इसे पार्टी के एजेंडे से जोड़ना गलत है। हालांकि, ट्विटर पर जनता की प्रतिक्रिया ने इसे संविधान पर हमला बताया। एक यूजर ने लिखा: "धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद हमारे संविधान की आत्मा हैं। इन्हें हटाना राजद्रोह के समान है।" दूसरी ओर, कुछ यूजर्स ने होसबले के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान जोड़े गए ये शब्द संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं हैं। निष्कर्ष: यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की संवैधानिक संरचना और उसके मूल मूल्यों पर गहन बहस को जन्म देता है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो गया है कि वे संविधान की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। दूसरी ओर, आरएसएस के बयान से यह संकेत मिलता है कि वैचारिक मतभेद अभी भी मौजूद हैं। भारतीय राजनीति के केंद्र में। समय ही बताएगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद राजनीतिक परिदृश्य को किस दिशा में ले जाएगा। लेकिन एक बात निश्चित है: भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक के लिए एक पवित्र दस्तावेज है, और इसकी रक्षा करना प्रत्येक देशभक्त का प्राथमिक कर्तव्य है। स्रोत: द हिंदू: हिंदुस्तान टाइम्स: इंडिया टुडे: द प्रिंट: एक्स-पोस्ट्स: