फ़तह-ए-मक्का (मक्का की विजय) के मौक़े पर जगह-जगह हुज़ूर रहमतुल लिल आलमीन ﷺ (सारे संसार के लिए दया होने) के जलवे नज़र आते हैं। बल्कि वास्तविकता यह है कि मक्का की विजय का सबसे बड़ा कारण ही वह घटना बनी जिसने आपके दर्दभरे और मानवता-प्रेमी दिल को तड़पा दिया था। सीरत-निगार (जीवनी लेखक) लिखते हैं:
सन् ६ हिजरी में जो समझौता (संधि) क़ुरैश ने नबी ﷺ से हुदैबिया के स्थान पर किया था, उसकी एक शर्त यह थी कि दस साल तक युद्ध नहीं होगा। इस शर्त के तहत जो क़बीले नबी ﷺ की तरफ़ शामिल होना चाहें वे उधर शामिल हो जाएं और जो क़ुरैश की तरफ़ शामिल होना चाहें वे इधर शामिल हो जाएं।
इसके अनुसार बनी ख़ुज़ाआ क़बीला नबी ﷺ की तरफ़ और बनू बक्र क़बीला क़ुरैश की तरफ़ शामिल हो गया। समझौते को अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए थे कि बनू बक्र ने बनी ख़ुज़ाआ पर हमला कर दिया, और क़ुरैश ने भी उन्हें हथियारों से मदद दी। इक्रमा बिन अबी जहल, सुहैल बिन अम्र (जिसने संधि पर दस्तख़त किए थे) और सफ़वान बिन उमय्या (क़ुरैश के मशहूर सरदार) खुद भी नक़ाबपोश (मुँह छिपाकर) होकर अपने साथियों के साथ बनी ख़ुज़ाआ पर टूट पड़े। उन बेचारों ने जान की भीख मांगी, भागकर ख़ाना काबा में पनाह ली, मगर उन्हें हर जगह बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। जब ये मज़लूम (पीड़ित) "इलाहका इलाहका" (अपने ख़ुदा के वास्ते) कहकर रहम की दरख़्वास्त करते, तो ये ज़ालिम जवाब में कहते "ला इलाह अल-यौम" (आज ख़ुदा कोई चीज़ नहीं है)। मज़लूमों के बचे-कुचे चालीस आदमी, जिन्होंने भागकर अपनी जान बचाई थी, नबी ﷺ की सेवा में पहुँचे और अपनी मज़लूमी व बर्बादी की दास्तान सुनाई।
इन घटनाओं को सुनकर आपका ﷺ दिल भर आया। समझौते का पालन करने, मज़लूमों की मदद करने और मित्र क़बीलों की भविष्य में हिफ़ाज़त के उद्देश्य से आप ﷺ दस हजार के लश्कर के साथ मक्का मुकर्रमा की ओर रवाना हुए।
आम रहमत (सार्वभौमिक दया)
रास्ते में अबू सुफ़ियान बिन अल-हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब और अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या हुज़ूर ﷺ से मिले। ये वे लोग थे जिन्होंने नबी ﷺ को सख़्त तकलीफ़ें दी थीं और इस्लाम को मिटाने में बड़ी कोशिशें की थीं। हुज़ूर ﷺ ने उन्हें देखा और अपना चेहरा फेर लिया। उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) ने अर्ज़ किया:
"ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! अबू सुफ़ियान आपके सगे चचा का बेटा है और अब्दुल्लाह आपकी सगी फूफी (आतिका) का लड़का है। इतने क़रीबी रिश्तेदार आपकी दया से वंचित नहीं रहने चाहिए।"
इसके बाद हज़रत अली (रज़ि.) ने इन दोनों को यह तरीक़ा बताया कि जिन शब्दों में यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने माफ़ी मांगी थी, तुम भी हुज़ूर ﷺ की सेवा में जाकर उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करो; नबी ﷺ के अफ़्व व करम (दया और क्षमा) से उम्मीद है कि ज़रूर कामयाब हो जाओगे।
उन्होंने नबी ﷺ के दरबार में हाज़िर होकर यह आयत पढ़ी: "क़ालू तल्लाही लक़द आसरकल्लाहु अलैना व इन कुन्ना लख़ातिईन" (यूसुफ़: ९१) (उन्होंने कहा कि ख़ुदा की क़सम! अल्लाह ही ने आपको हम पर फ़ज़ीलत दी है और हम ही ख़ताकार हैं)। रसूलुल्लाह ﷺ ने जवाब में फ़रमाया: "ला तस्रीबा अलैकुमुल यौम, यग़फ़िरुल्लाहु लकुम वहुवा अहरमुर राहिमीन" (आज तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं, अल्लाह तुम्हें माफ़ करे और वह सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है)।
रसूलुल्लाह ﷺ ने माफ़ी और अमन व सुरक्षा के दायरे को उस दिन इतना फैला दिया कि मक्का वालों में से सिर्फ वही शख़्स हलाक हो सकता था जो खुद माफ़ी और सलामती न चाहता हो। आपने फ़रमाया कि जो अबू सुफ़ियान के घर में दाख़िल हो जाएगा उसे पनाह मिलेगी, जो अपने घर का दरवाज़ा बंद कर लेगा वह महफ़ूज़ है, जो मस्जिदे हराम में दाख़िल होगा उसे अमन है। रसूलुल्लाह ﷺ ने लश्कर को हिदायत दी कि मक्का में दाख़िल होते वक़्त सिर्फ उसी शख़्स पर हाथ उठाएं जो उनके रास्ते में रुकावट बने, और मक्का वालों की संपत्ति का पूरा ध्यान रखा जाए, उसमें बिल्कुल लूटपाट न की जाए।
फ़तह के दिन एक शख़्स ने आपसे ﷺ बातचीत की तो (आपके रोब से) उस पर कँपकँपी तारी हो गई। आपने फ़रमाया: "डरो नहीं, इत्मीनान रखो, मैं कोई बादशाह नहीं हूँ। मैं तो क़ुरैश की एक ऐसी औरत का बेटा हूँ जो सूखे हुए गोश्त के टुकड़े खाया करती थी।"
आज तो रहम और माफ़ी का दिन है
जब हज़रत साद बिन उबादा (रज़ि.), जो अंसार के दस्ते के अमीर थे, अबू सुफ़ियान के पास से गुज़रे तो उन्होंने कहा: "अल-यौम यौमुल मलहमा..." (आज घमासान की लड़ाई और ख़ून-ख़राबे का दिन है, आज काबा में सब जायज़ होगा, अल्लाह ने क़ुरैश को ज़लील किया है)।
जब रसूलुल्लाह ﷺ अपने दस्ते के साथ अबू सुफ़ियान के पास से गुज़रे, तो उन्होंने आपसे इसकी शिकायत की। आप ﷺ ने साद के इस जुमले को नापसंद फ़रमाया और कहा: "अल-यौम यौमुल मरहमा..." (नहीं, आज तो रहम और माफ़ी का दिन है, आज अल्लाह तआला क़ुरैश को इज़्ज़त अता फ़रमाएगा और काबा की अज़मत बढ़ाएगा)।
आपने हज़रत साद (रज़ि.) को बुलवाया और इस्लामी परचम (झंडा) उनसे लेकर उनके बेटे क़ैस के हवाले कर दिया। आपने यह सोचा कि उनके बेटे को झंडा देने का मतलब यह होगा कि मानो झंडा उनके ख़ानदान से वापस नहीं लिया गया।
इस तरह सिर्फ एक अक्षर के बदलाव से ('मलहमा' की जगह 'मरहमा' फ़रमा देने से) और झंडे को एक हाथ से दूसरे हाथ (बाप से बेटे के हाथ) में बदल देने से, आपने साद बिन उबादा (जिनकी सेवाएँ सूरज की तरह साफ़ थीं) का दिल दुखाए बिना अबू सुफ़ियान का दिल जीत लिया।
आज का दिन तो भलाई और वफ़ा का है
हुज़ूर ﷺ काबा पहुँचे और वहाँ तवाफ़ किया। तवाफ़ पूरा करने के बाद उस्मान बिन तल्हा को बुलवाया, जो काबा के चाबी-बरदार (custodian) थे। काबा की चाबी उनसे ली गई, दरवाज़ा खोला गया और आप ﷺ काबा में दाख़िल हुए। इससे पहले, मदीना हिजरत करने से पहले एक दिन जब आपने उनसे चाबी मांगी थी, तो उन्होंने सख़्त जवाब दिया था और आपका अपमान किया था। तब आपने सब्र से काम लेते हुए फ़रमाया था: "उस्मान! तुम यह चाबी किसी दिन मेरे हाथ में देखोगे, उस वक़्त मैं जिसे चाहूँगा उसे दूँगा।" इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो वह दिन क़ुरैश की तबाही का होगा। आपने फ़रमाया था: "नहीं, उस दिन क़ुरैश आबाद और बा-इज़्ज़त होंगे।" यह बात उस्मान बिन तल्हा के दिल में बैठ गई थी।
जब आप ﷺ काबा से बाहर आए तो चाबी आपके पवित्र हाथ में थी। आपको देखते ही हज़रत अली (रज़ि.) खड़े हो गए और अर्ज़ किया: "अल्लाह आप पर दरूद व सलाम भेजे, हाजियों को पानी पिलाने (सक़ाया) के साथ काबा की दरबानी (हिजाबा) भी हमें अता फ़रमाएँ।"
नबी ﷺ ने फ़रमाया: "अल-यौम यौमुल बिर्रे वल-वफ़ा" (आज का दिन तो सुलूक करने और वफ़ा निभाने का है)। फिर उस्मान को बुलाया, उन्हें चाबी सौंपी और फ़रमाया: "जो कोई तुमसे यह चाबी छीनेगा वह ज़ालिम होगा।"
जाओ, तुम सब आज़ाद हो
ख़ुत्बे (भाषण) के बाद आप ﷺ ने मजमे (भीड़) की तरफ़ देखा तो क़ुरैश के बड़े-बड़े ज़ालिम सामने खड़े थे। उनमें वे लोग भी थे जो इस्लाम को मिटाने में सबसे आगे थे; वे भी थे जिनकी ज़बानें रसूलुल्लाह ﷺ पर गालियाँ बरसाती थीं; वे भी थे जिनकी तलवारों ने आपकी पवित्र ज़ात पर हमले किए थे; वे भी थे जिन्होंने आपके रास्ते में कांटे बिछाए थे; वे भी थे जो प्रचार के वक़्त आपकी एड़ियों को लहूलहान कर दिया करते थे; और वे भी थे जो मुसलमानों को जलती रेत पर लिटाकर उनके सीनों पर गर्म पत्थर रख दिया करते थे।
रहमत-ए-आलम ﷺ ने उनकी तरफ़ देखा और पूछा: "तुम्हें कुछ मालूम है, मैं तुम्हारे साथ क्या मामला करने वाला हूँ?"
वे लोग भले ही ज़ालिम थे, लेकिन हुज़ूर ﷺ के मिज़ाज को जानते थे। पुकार उठे: "अख़ुन करीमुन वब्नु अखिन करीम" (आप शरीफ़ भाई हैं और शरीफ़ भतीजे हैं)।
इरशाद हुआ: "ला तस्रीबा अलैकुमुल यौम, इज़्हबू फ़-अंतुमुल तुलक़ा" (तुम पर आज कोई इल्ज़ाम नहीं, जाओ तुम सब आज़ाद हो)। मक्का के काफ़िरों ने तमाम मुहाजिरों (हिजरत करने वालों) के मकानों पर क़ब्ज़ा कर लिया था। अब वक़्त था कि उन्हें अधिकार दिलाए जाते, लेकिन आपने मुहाजिरों को हुक्म दिया कि वे भी अपनी संपत्तियों से दस्तबरदार (दावा छोड़ दें) हो जाएं।
अरब के शीर्ष दस सरदारों में से सफ़वान बिन उमय्या जिद्दार की तरफ़ भाग गए। उमैर बिन वहब ने हुज़ूर ﷺ की सेवा में आकर अर्ज़ किया कि अरब का एक रईस मक्का से जा रहा है। आपने अमन की निशानी के तौर पर अपना इमामा (पगड़ी) अता फ़रमाया। उमैर वहाँ पहुँचे और उन्हें वापस लाए; उन्होंने हुनैन के युद्ध के बाद इस्लाम स्वीकार किया।
अब्दुल्लाह बिन ज़िबअरी, जो अरब का कवि था और नबी ﷺ की निंदा में कविताएँ लिखता था, नजरान भाग गया था, लेकिन बाद में आकर इस्लाम स्वीकार किया।
इक्रमा बिन अबी जहल की पत्नी उम्मे हकीम फ़तह के दिन इस्लाम लाईं, लेकिन उनके पति इक्रमा भागकर यमन चले गए थे। उम्मे हकीम यमन गईं, उन्हें इस्लाम की दावत दी, और वे मुसलमान होकर मक्का आए। हुज़ूर ﷺ ने जब उन्हें देखा तो खुशी के मारे फ़ौरन खड़े हो गए और इतनी तेज़ी से उनकी तरफ़ बढ़े कि शरीर से चादर तक हट गई, फिर उनसे बैअत (शपथ) ली।
वहशी को भी माफ़ कर दिया गया, जिसने धोखे से अमीर हमज़ा (अल्लाह और उसके रसूल के शेर) को शहीद किया था और उनके शव का अपमान किया था।
दुनिया जानती है कि युद्धबंदियों के साथ क्या सुलूक किया जाता है। इतिहास गवाह है कि संस्कृति और सभ्यता का ढिंढोरा पीटने वालों ने आम नागरिकों के साथ क्या-क्या नहीं किया। लेकिन इस्लाम का यह सबसे बड़ा युद्ध (फ़तह-ए-मक्का), जिसके बाद लोग सेना दर सेना इस्लाम में दाख़िल हुए, सरापा रहमत नबी ﷺ की ज़ात का सदक़ा है। पूरे युद्ध में एक-दो घटनाओं को छोड़कर न किसी का ख़ून बहा, न किसी को मामूली चोट आई। दया और आम माफ़ी की ऐसी मिसाल दुनिया ने न कभी देखी है और न क़यामत तक देख सकेगी।
_____________________________________
किताब: उसवा-ए-रहमत
लेखक: मौलाना बिलाल अब्दुल हई हसनी नदवी
सफ़्हा नंबर: २८ से ३९
लेख संकलन: मौलाना अनस मेमन पालनपुरी (इक़बाल गढ़ी)
اناس میمن پلانپوری